भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १२५ हमारे वहाँ बैठे रहते ही अलम्बुषा नाम की एक अप्सरा ब्रह्मा के दर्शनार्थ वहाँ आई, उसका वस्त्र वायु से कुछ खिसक गया इधर-उधर हो गया ॥२४॥ उसे देखकर वह विभूम वसु कामातुर हो गया और वह (अलम्बुषा) भी उसके रूप की ओर आँखों के खिंच जाने से स्तब्ध-सी (ठगी-सी) रह गई ॥२५॥ उन दोनों की इस स्थिति को देखकर ब्रह्मा ने मेरी ओर देखा। मैंने भी उनके अभिप्राय को समझकर, क्रुद्ध होकर उन दोनों को शाप दिया ॥२६॥ शाप यह दिया कि 'तुम्हारा जन्म मर्त्यलोक में पति-पत्नी के रूप में होगा। इस शाप के कारण हे राजन्, तुम चन्द्रवंश में राजा शतानीक के पुत्र हुए और वह अप्सरा अयोध्या के राजा कृतवर्मा की मृगावती नामक कन्या के रूप में अवतीर्ण हुई है। वही तुम्हारी पत्नी होगी' ॥२७-२८-२९॥ राजा के स्नेहयुक्त हृदय में पहले से ही सुलगता हुआ मदनानल इन्द्र की बातों से प्रेरित होकर तुरन्त प्रज्वलित हो उठा ॥३०॥ तदनन्तर इन्द्र के द्वारा भली भाँति स्वागत प्राप्त करके इन्द्र के ही रथ से भेजा गया राजा सहस्रानीक मातलि के साथ अपनी नगरी को लौट आया ॥३१॥ जाते हुए राजा से तिलोत्तमा नाम की अप्सरा ने प्रेमपूर्वक कहा—'हे राजन् ! जरा ठहरो, मैं तुमसे कुछ कहूँगी' ॥३२॥ मृगावती के ध्यान में निमग्न राजा ने तिलोत्तमा का कथन नहीं सुना। इसलिए उसने कुपित होकर राजा को शाप दिया ॥३३॥ 'हे राजन् ! जिस मृगावती में आकृष्टचित्त होकर तू मेरी बात नहीं सुन रहा है, उसका तुझे चौदह वर्षों तक वियोग होगा' ॥३४॥ तिलोत्तमा के शाप को मातलि ने सुना, राजा ने नहीं। प्रिया के लिए उत्सुक वह राजा रथ से कौशाम्बी और मन से अयोध्या पहुँचा ॥३५॥ राज्य में पहुँचकर राजा ने मृगावती के सम्बन्ध में इन्द्र से सुना हुआ समस्त वृत्तान्त उत्सुक मन से युगन्धर आदि मन्त्रियों को कह सुनाया ॥३६॥ और विलम्ब को न सहन कर सकनेवाले राजा ने उस कन्या (मृगावती) की मैंगनी के लिए अयोध्या में राजा कृतवर्मा के समीप दूत भेजा ॥३७॥ दूत द्वारा सहस्रानीक के सन्देश को सुनकर राजा कृतवर्मा ने हर्ष में यह संवाद अपनी रानी कलावती से कहा ॥३८॥