कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १४१ निष्ठुरक की बातें सुनकर धीदत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों ढाढस देने की भावना से अपनी आँखों को हृदय पर डाला ॥६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ धीदत्त निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ॥६८॥ गंगा में गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मित्र निष्ठुरक को मार्ग में सुनाते हुए धीदत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥६९॥ मैं असहाय अबला हूँ मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ—उस अबला के ऐसा कहने पर धीदत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ॥७०॥ दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर धीदत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, अतएव शून्य नगर में ठहर गया ॥७१॥ इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए धीदत्त ने उस स्त्री को जो निष्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी देखा ॥७२॥ यह देखते ही धीदत्त मृगांक नामक खड्ग को खींचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ॥७३॥ धीदत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी— ॥७४॥ "महाभाग ! मुझे मत मारो। मैं राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे उस समय कुबेर ने मुझे उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था क्योंकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥७६॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥ मेरे राक्षसी-रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन् ! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा' ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार मैं इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ॥७९॥ मैंने ही बहुत समय से इस नगर को त्रस्त रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो" ॥८०॥ उसकी इस प्रकार बातें सुनकर धीदत्त ने आदर के साथ कहा— 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगूँ ? यह मेरा मित्र जी जाय यही वर दो' ॥८१॥