कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवक्तव्य परिषद् के लक्ष्य और उद्देश्य में भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं के साहित्यिक सांस्कृतिक शास्त्रीय वैज्ञानिक आदि विषयक ग्रन्थों को विशुद्ध हिन्दी-भाषा में अनूदित कर प्रकाशित करना भी रहा है और इस दिशा में परिषद् ने अबतक राजशेखर की संस्कृत के साहित्य शास्त्रविषयक 'काव्यमीमांसा' डॉ पिशल द्वारा जर्मन भाषा में लिखित 'कम्परेटिव ग्रामर ऑफ़ दि प्राकृत लैंग्वेजेज' ('प्राकृत भाषाओं का व्याकरण' के नाम से अनूदित) फ्रेंच भाषा में मारिस मेटर्लिंक-लिखित 'ल्वासे ब्यू' तथा अँगरेजी में लिखित और कलकत्तों के ही द्वारा रूपा न्तरित 'वैभवत' और 'संस्कृतविदग्धा एक अनुशीलन' के हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित किये हैं और उपर्युक्त अनुवाद-ग्रन्थों का अच्छा समादर भी हुआ है। प्रस्तुत ग्रंथ महाकवि सोमदेवभट्ट-कृत 'कथा सरित्सागर' नामक बृहत् ग्रंथ के प्रथम खण्ड का मूल संस्कृत-सह हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है। उक्त कथा-सरित्सागर का अनुवाद पण्डित केदारनाथ शर्मा सारस्वत ने किया है किन्तु सम्पूर्ण ग्रंथ का अनुवाद वे अपने जीवन में पूरा न कर सके। हमें खेद है कि अचानक ही उनका देहावसान हुआ और उन्हें अपने अनुवाद के प्रथम खण्ड का प्रकाशन देखने का अवसर न मिल सका। उन्होंने प्रकाशन की सुगमता के उद्देश्य से सम्पूर्ण ग्रंथ को तीन खण्डों में विभक्त किया था। सम्पूर्ण ग्रंथ १८ लम्बकों में विभक्त है। उनमें केवल ६ लम्बकों का यह प्रथम खण्ड अभी प्रकाश में आ रहा है अन्य ६ लम्बकों का दूसरा खण्ड शीघ्र ही प्रेस में दिया जायगा और शेष ६ लम्बकों का अनुवाद किसी योग्य संस्कृत-हिन्दी के विद्वान से करा कर प्रकाशित करके इस बृहत् ग्रंथ का काम समाप्त किया जायगा। जिस दिन उपर्युक्त तीनों खण्ड प्रकाश में आ जायेंगे उस दिन हमें विशेष प्रसन्नता होगी। इस ग्रंथ की भूमिका संस्कृत-हिन्दी के ख्यातिप्राप्त विद्वान डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल (पुरातत्त्व-विभाग हिन्दू-विश्वविद्यालय वाराणसी) ने लिखने की कृपा की है। आपने अपनी भूमिका में मूल ग्रंथ के सम्बन्ध में जैसा विद्वत्तापूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है उससे ग्रंथ की उपयोगिता और सर्वप्रियता ही सिद्ध होती है। हम परिषद् की ओर से इस कृपापूर्ण सहयोग के लिए आपका आभार स्वीकार करते हैं। साथ ही स्वर्गीय सारस्वतजी की आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थी हैं। पाठक-समाज प्रस्तुत ग्रंथ का मूल-सह अनुवाद पढ़कर आनन्द का अनुभव करेगा ऐसा हमारा विश्वास है। बैद्यनाथ पाण्डेय १ ५ ५ संपादक