भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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को संस्कृत-भाषा में न बोलने का आदेश हुआ। वह एक ऋषि के आश्रम में जाकर रहने लगा। वहाँ उसे पुलस्त्य ऋषि ने पैशाची भाषा में अपनी कथाएँ लिख डालने का परामर्श दिया और यह भी कहा कि ग्रंथ-समाप्ति के बाद वह नेपाल में शिवलिंग की स्थापना करके शाप-विमुक्त होकर मर्त्य-योनि से छूटेगा। गुणाढ्य गेरू से पेड़ की पत्तियों पर कथा लिखने लगा। वह उन्हें उच्चस्वर में पढ़ता जाता था जिसे सुनकर जंगल के पशु-पक्षी मोहित हो गए। यह बात राजा ने सुनी और जंगल में जाकर सब कुछ अपनी आँखों से देखा। उसने गुणाढ्य से सभा में लौट जाने का अनुरोध किया पर गुणाढ्य ने उसे स्वीकार न किया और कहा—'मैंने सौ लाख श्लोकों में पैशाची भाषा में इस कथा की रचना की है। आप इसकी रचना संस्कृत में कराएँ। मैं तो अब नेपाल जाऊँगा। तब उसने नेपाल जाकर पशुपतिनाथ शिव के दर्शन किए। वहीं रहनेवाले मुनियों को एकत्र करके उसने भृङ्गीश्वर शिव की स्थापना की और वहाँ से वह कैलाश चला गया। कथासरित्सागर के आरंभ में सोमदेव ने उसके स्वरूप और वर्ण्य विषयों का अच्छा परिचय दिया है। मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। इसमें पहला लम्बक कथापीठ है। उसके बाद दूसरा कथामुख है। तीसरे लम्बक का नाम लावानक है। चौथे लम्बक में नरवाहनदत्त का जन्म है। उसके बाद पाँचवें लम्बक का नाम चतुर्दारिका है। छठा लम्बक मदनमंचुका और सातवाँ रत्न प्रभा नाम का है। आठवें लम्बक का नाम सूर्यप्रभा है। नवाँ अलंकारवती लम्बक है। दसवाँ शक्तियशस् लम्बक और ग्यारहवाँ वेला लम्बक है। बारहवाँ शशांकवती और तेरहवाँ मदिरा वती लम्बक है। उसके बाद पंच नामक चौदहवाँ लम्बक और पन्द्रहवाँ महाभिषेक लम्बक है। उसके बाद १६वाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक और अट्ठारहवाँ विषमशील लम्बक है। कथाओं को कहने की दृष्टि से सोमदेव का अपना पद है। उसकी प्रवाहमयी शैली की रोचकता को दूसरा कोई नहीं पहुँच पाता। सी एच टॉनी (C. H. Tawney) कृत कथासरित्सागर के अंग्रेजी-अनुवाद की भूमिका में पेंजर ने सोमदेव के ग्रंथ की प्रशंसा में लिखा है— 'जब हम इस ग्रंथ को देखते हैं तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएं इसमें हैं। द्य लोक और पृथ्वी के निर्माण-संबंधी ऋग्वेदकालीन कथाएं भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करने वाले बेतालों की कहानियां सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियां और देवता मनुष्य एवं असुरों के युद्ध की कहानियां भी इस संग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची भूमि है जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़ चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक नहीं है। 'इन कहानियों का संग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था।