भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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द्वितीय लम्बक १९५ इस प्रकार सन्देश भेजकर राजा उदयन ने मन्त्रियों से कहा—'मैं अभी जाता हूँ और चंडमहासेन को बाँधकर लाता हूँ' ॥२८॥ राजा के विचार सुनकर मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा करना न तो सम्भव है और न उचित ही है। वह राजा प्रभावशाली है और उसे तुम्हें अपनाना भी चाहिए। इसके सम्बन्ध में विस्तार से कहता हूँ सुनो' ॥२९ १/२ ॥ राजा चंडमहासेन की कथा इस भूलोक में उज्जयिनी नाम की नगरी है जो भूलोक का भूषण है और सुधा-धवल प्रासाद-पंक्तियों से वह इन्द्रपुरी अमरावती को मानों हँसती है ॥३१॥ जिस नगरी में महाकाल भगवान् शिव कैलास का निवास छोड़कर रहा करते हैं ॥३२॥ इस नगरी में राजाओं में श्रेष्ठ महेन्द्रवर्मा नाम का राजा था और जयसेन नामक उसी के समान उसका पुत्र हुआ ॥३३॥ उस जयसेन का अनुपम बलशाली पुत्र महासेन हुआ ॥३४॥ उस महासेन ने बहुत दिनों तक शासन करते हुए सोचा कि न तो मेरे पास मेरे योग्य खड्ग है और न उच्चकुलप्रसूत पत्नी ही है ॥३५॥ ऐसा सोचकर वह राजा महासेन चंडिका के मन्दिर में गया और निराहार रहकर चिरकाल तक उसकी (चंडिका की) आराधना करने लगा ॥३६॥ अपना मांस काटकर जब उसने देवी के लिए हवन किया तब देवी ने प्रसन्न होकर कहा— 'पुत्र ! मैं तेरी आराधना से प्रसन्न हूँ। यह उत्तम खड्ग लो, इसके प्रभाव से शत्रु तुम्हें जीत न सकेंगे। तुम उनके लिए अजय हो जाओगे और अंगारकासुर की अङ्गारवती नाम की कन्या है जो त्रैलोक्य में ललाम सुन्दरी है वह शीघ्र ही तुम्हारी पत्नी बनेगी। तुमने अपना मांस काटकर बलि देते हुए भयङ्कर यह (उग्र) कार्य किया है अतः तुम्हारा नाम चण्डमहासेन होगा। इतना कहकर और खड्ग को देकर देवी अन्तर्धान हो गईं और राजा भी मानसिक सङ्कल्प की सफलता होने का अनुभव करने लगा ॥३७-४१॥