भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक २३ वत्सराज ने उसे पीछा करते हुए देखकर बाणों से युद्ध प्रारम्भ किया। किन्तु नडागिरि ने मदवती हाथी को देखकर प्रहार नहीं किया॥२९॥ तदनन्तर पिता की आज्ञा से आये हुए दूसरे राजकुमार गोपालक ने जाकर पालक को लौटा लिया। उसके लौट जाने पर वत्सराज भी सुख और शान्तिपूर्वक सारा दिन यात्रा करता रहा। धीरे-धीरे रात समाप्त हुई। तब मध्याह्न समय तिरसठ योजन चल लेने पर हस्तिनी को प्यास लगी॥३०-३२॥ राजा और रानी के उतर जाने पर हस्तिनी ने पेट भर पानी पिया और इसी कारण वह मर भी गई ॥३३॥ घोर विन्ध्यारण्य में खड़े और हस्तिनी के मर जाने से दुःखित राजा ने आकाशवाणी सुनी—॥३४॥ 'हे राजन् ! मैं मायावती नाम की विद्याधरी हूँ। शाप के कारण हस्तिनी बन गई थी। मैंने अपने जीवन के रहते तुम्हें भागने में सहायता दी। भविष्य में भी तुम्हारे होनेवाले पुत्र का उपकार करूँगी॥३५-३६॥ कुमारी वासवदत्ता जो तुम्हारी पत्नी होनेवाली है वह भी मानव नहीं है, प्रत्युत शाप के कारण मनुष्य-रूप में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई है॥३७॥ तब राजा ने अपने नर्म-सचिव वसन्तक को विन्ध्य-शिखर पर स्थित अपने मित्र पुलिन्दक को अपने आगमन की सूचना देने के लिए भेजा॥३८॥ और स्वयं भी राजा वासवदत्ता के साथ पदयात्रा करता हुआ धीरे-धीरे उसी ओर जाता हुआ डाकुओं से घेर लिया गया। हाथ में धनुष लिये हुए राजा अकेला था और डाकू संख्या में एक सौ पाँच थे। राजा उदयन ने वासवदत्ता के देखते-देखते सबको एक-एक करके मार डाला॥३९-४०॥ उसी समय वत्सराज का मित्र पुलिन्दक वसन्तक को आगे किये हुए यौगन्धरायण के साथ आ पहुँचा॥४१॥ पुलिन्दक ने आते ही बचे-खुचे डाकुओं को भगाकर वत्सराज को प्रणाम किया और वासवदत्ता के साथ उसे अपने ग्राम में ले गया॥४२॥ जंगली कुशाओं के आघात से छिले हुए कोमल चरणोंवाली वासवदत्ता के साथ राजा ने उस रात्रि को भिल्लपल्ली में ही व्यतीत किया॥४३॥