कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक २४३ वासवदत्ता के रहते वत्सराज भी दूसरा विवाह न करेगा। उसका अत्यधिक स्नेह है। 'महारानी जल गई' ऐसा घोषित करने पर सब कुछ सिद्ध हो जायगा ॥२४॥ पद्मावती के साथ वत्सराज का विवाह हो जाने पर सम्बन्धी मगध-नरेश पीछे से आक्रमण न करेगा बल्कि सहायक ही बनेगा ॥२५॥ इसलिए हम पहले पूर्व दिशा की ओर आक्रमण करेंगे और क्रमशः अन्य दिशाओं की ओर जायंगे इस प्रकार वत्सराज के लिए सारी भूमि को वश में करेंगे ॥२६॥ 'हमारे उद्योग करने पर राजा समस्त पृथ्वी का शासक बन सकेगा'—ऐसी आकाशवाणी भी पहले हो चुकी है' ॥२७॥ मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण की इस योजना को सुनकर और इसे एक साहस-मात्र समझकर रुमण्वान् उससे बोला—पद्मावती के लिए किया हुआ बहाना कदाचित् हमारे लिए प्रतिकूल बैठे ? और कहीं हमी न दोषी ठहराये जायें ? यह सम्भव है। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनो —॥२८ २९॥ धूर्त साधु की कथा गंगा-तट पर माकन्दिका नाम की एक नगरी है। उस नगरी में मौनव्रत धारण किये हुए एक परिव्राजक रहता था ॥३०॥ भिक्षाटन द्वारा भोजन करनेवाला वह संन्यासी अनेक संन्यासी चेलों के साथ किसी दैव-मन्दिर के अन्दर मठिया में रहता था ॥३१॥ एक बार वह भिक्षा माँगते-माँगते किसी वैश्य के घर में गया और उसने वहाँ भिक्षा लेकर निकली हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा। उस अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखकर वह दुष्ट परिव्राजक काम के वशीभूत होकर 'हाय रे ! मर गया !' इस प्रकार बोला जबकि वह वैश्य (कन्या का पिता) सुन रहा था ॥३२ ३३॥ तदनन्तर भिक्षा लेकर अपने स्थान पर लौट आया। तब वह वैश्य उसके समीप जाकर प्रणाम व आश्चर्य से पूछने लगा कि हे संन्यासी ! आज तुमने अकस्मात् अपना मौन-व्रत क्यों भंग किया और चिल्ला उठा। यह सुनकर संन्यासी बोला — तुम्हारी कन्या का लक्षण अशुभ है। इसका जब विवाह होगा तब तुम्हारा स्त्री पुत्र आदि के साथ अवश्य नाश हो जायगा। अतः उस कन्या को देखकर मुझे दुःख हुआ क्योंकि तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हारी हानि नहीं देख सकता। अतः तुम्हारे लिए ही मैंने मौन का त्याग किया। इसलिए इस कन्या को काठ के सन्दूक में बन्द करके उसपर दिया जलाकर नदी में बहा दो ॥३४ ३८॥