भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक १०७ तब उस ग्वालराज ने हमलोगों को आज्ञा दी कि इसके पैर काटकर इसे दंड दो। तब हमलोगों ने दौड़कर इसके पैर काट दिये। राजा की आज्ञा का उल्लंघन कौन कर सकता है॥३६-३७॥ इस प्रकार ग्वालों के निवेदन करने पर उसका रहस्य समझकर बुद्धिमान् यौगन्धरायण ने राजा से एकान्त में कहा—महाराज ! अवश्य ही उस स्थान में खजाना आदि है। उसी के प्रभाव से ग्वाला भी वहाँ राजा बनने की सोचता है। अतः आप वहाँ चलें। मंत्री के ऐसा कहने पर राजा सेना और सामान के साथ वहाँ गया॥३८-४०॥ वत्सराज को खजाना और सिंहासन की प्राप्ति जंगल में जाकर और भूमि की परीक्षा करके जब कर्मकर (मजदूर) भूमि को खोदने लगे तब उस गड्ढे के नीचे से एक पर्वताकार यक्ष निकला। और राजा से बोला कि 'राजन् ! तुम्हारे दादा का रखा हुआ यह खजाना है। मैंने बहुत समय तक उसकी रक्षा की। अब तुम इसे सम्हालो'॥४१-४२॥ वत्सराज को इस प्रकार कहकर और उसके दिये हुए उपहारों को स्वीकार कर यक्ष अन्तर्धान हो गया और राजा का उस गड़े में बहुत बड़ा खजाना मिला॥४३॥ राजा ने उसकी प्रसन्नता में उत्सव मनाया और उस धन को एवं बहुमूल्य रत्न-सिंहासन को लेकर तथा उन ग्वालों को समुचित दंड देकर वह अपनी राजधानी कौशाम्बी को लौट आया॥४४॥ उन्नति का समय आने पर अनेक प्रकार की शुभ बातें होती हैं। कौशाम्बी में राजा द्वारा लाकर राजभवन में रखे गये उस सिंहासन को नागरिक जनता देखने लगी। और बजते हुए वाद्य के समान सुन्दर आनन्द-शब्द 'वाह-वाह' करने लगे॥४५॥ वह सिंहासन जड़ी हुई लाल मणियों की किरणों के प्रसार से मानों राजा उदयन चारों दिशाओं में फैलनेवाले अभ्युदय की सूचना दे रहा था॥४६॥ चाँदी के तारों से पिरोये हुए मोतियों की शुभ्र कड़ियों की उज्ज्वल प्रभा से वह सिंहासन पन्ना के मणियों के अत्यन्त आश्चर्य पर मानों हँस रहा था॥४७॥ उस सिंहासन के प्रभाव को देखकर मन्त्रियों को राजा के दिग्विजय का निश्चय हो गया। अतः वे भी उत्सव मनाने लगे॥४८॥ १. सिंहासन बत्तीसी की कथा में भोजराज के विषय में इसी ढंग की कथा मिलती है। उसे भी उसी प्रकार सिंहासन की प्राप्ति हुई थी।