कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ३७१ राज-सेवक ने राजकुमारी के मुंह से सुना हुआ सारा समाचार राजा से कह दिया ॥१९५॥
विदूषक के मन और बल को जाननेवाला राजा 'यह क्या बात है ? - ऐसा सोचता हुआ व्याकुल-सा हो गया। और कन्या के महल से विदूषक को बुला ठीक-ठीक समाचार पूछा। उसने भी प्रारम्भ से अन्त तक सारा समाचार कह डाला। और कपड़े के कोने में बँधे हुए उन चोरों की कटी हुई नाक भी दिखा दी साथ ही प्रव्राजक के उस भूमिश्रेणी सरभों के शवों को भी दिखाया ॥१९६-१९९॥
राजा ने सारी घटना का सत्य समझकर सभी मठवासी ब्राह्मणों को चक्कर के साथ बुलाया और उनसे मूल कारण जानकर श्मशान में जाकर उन तीनों नक-कटों को देखा और कटे हुए गलेवाले उस दुष्ट साधक को (देवी-मन्दिर में) देखा ॥२०-२१॥
इन प्रमाणों से विश्वस्त राजा ने कन्या को प्राणदान करनेवाले विदूषक को अपनी कन्या प्रदान कर दी। सच है उदार व्यक्तियों के उपकारों के लिए कौन-सी वस्तु अदेय है? ॥२०२॥
राजकुमारी के हाथ में लक्ष्मी का निवास था इसी कारण विदूषक ने उसका पाणि-ग्रहण करते ही लक्ष्मी को प्राप्त किया ॥२०४॥
वह यशस्वी विदूषक अपनी पत्नी के साथ आदरसम्पन्न के घर राजाओं के समान रहने लगा ॥२०५॥
कुछ दिनों के बाद दैव से प्रेरित राजकन्या ने रात्रि में विदूषक से कहा कि 'हे स्वामिन् ! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि देवी-मन्दिर में आकाशवाणी ने कहा था कि 'एक मास बाद तुम यहाँ आना' । तदनुसार आज मास समाप्त हो गया आप उसे भूल गए। पत्नी ने यह सुनकर विदूषक प्रसन्न हुआ। और बोला- 'प्रिये ! तुमने अच्छा स्मरण दिला दिया मैं उसे भूल ही गया था। ऐसा कहकर उसने उसे पुरस्कार में आलिंगन दिया ॥१-२ ॥ ४२