भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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भूमिका कथासरित्सागर कहानी-साहित्य का शिरोमणि ग्रन्थ है। इसे काश्मीर में पंडित सोमदेव ने त्रिगर्त या कुल्लू-काँगड़ा के राजा की पुत्री काश्मीर के राजा अनन्त की रानी सूर्यमती के मनो- विनोद के लिए ई १०६३ और १०८१ के बीच में लिखा। ग्रन्थ में २१३८८ पद्य हैं और लेखक ने उसे १२४ तरंगों में बाँटा है। इसका एक दूसरा विभाग लम्बकों में है जिनकी संख्या १८ है। यह ग्रन्थ अपने वर्तमान रूप में अनेक छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह है। सोमदेव ने यथार्थ ही इसे कथा-रूपी सरिताओं का सागर कहा है। अपने ग्रन्थ के आरम्भ में उन्होंने मूल्यवान् सूचना के रूप में लिखा है— बृहत्कथायाः सारस्य संग्रहं रचयाम्यहम्। (प्रथम तरंग श्लोक तीन) इसी सूचना को अन्तिम प्रशस्ति में इस प्रकार विशद रूप से कहा है— नानाकथामृतमयस्य बृहत्कथायाः सारस्य सज्जनमनोम्बुधिपूर्णचन्द्रः । सोमेन विप्रवरभूरिगुणाभिरामरामात्मजेन विहितः खलु संग्रहोऽयम् ॥ अर्थात्—कथासरित्सागर अनेक कथाओं के अमृत की खान बृहत्कथा नामक ग्रन्थ का सार है। बृहत्कथा पैशाची भाषा का ग्रन्थ था जिसकी रचना गुणाढ्य ने सातवाहन राजाओं के समय में प्रथम-द्वितीय शती के लगभग की थी। आन्ध्र-सातवाहन-युग में स्थल-जल-मार्गों पर अनेक सार्थवाह पोताधिपति एवं सांयात्रिक व्यापारी रात-दिन चहल-पहल रखते थे। टकटक करके तारों से भरी हुई लम्बी रातों में उनके मनोविनोद के लिये अनेक कहानियों की रचना स्वाभाविक थी जिनमें उन्हीं के देशान्तर-भ्रमण से उत्पन्न अनुभवों का अमृत निचोड़ा जाता था। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के पहाड़ों और जंगलों एवं गाँवों और नगरों की तिल-तिल भूमि को अपने पैरों से रूँदते हुए उनके चरण सदा रौंदते रहते थे। इसी प्रकार पूर्व और पश्चिम के समुद्रों पर उनके प्रवहण सरपट छूटते थे। सातवाहन-नरेशों की मुद्राओं पर अंकित जलयानों के चित्र उस काल के सामुद्रिक व्यापार और द्वीपान्तर-संनिवेश की सूचना देते हैं। उसी के प्रयत्नों से बृहत्तर भारत का वह रूप सम्पन्न हो पाया जिसे मत्स्यपुराण के लेखक ने बारह द्वीपों और एकान्त रत्नों से निर्मित 'नानापण्य महार्णव' कहकर प्रणाम किया है (द्वादशार्णववां द्वीप चैकादशापरस्तन मत्स्य २४८।२२-२६)। उन्हीं उद्यमी सार्थों और नाविकों के अनुभवों की बहुमुखी सामग्री को गुणाढ्य ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से बृहत्कथा के साँचे में ढाल दिया था।