भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक ३६५ वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण इस प्रकार, धर्म से कमाई हुई लक्ष्मी सन्तान-परम्परा तक नष्ट नहीं होती और पाप की कमाई पत्ते पर पड़ी ओस की बूँद के समान विनाशशील होती है ॥५०॥ इसलिए पुरुष को चाहिए कि धर्म से धन कमावे। राजा के राज्य-रूपी वृक्ष का तो धर्म से अर्जित धन ही मूल है। अतः महाराज ! मन्त्रिमण्डल का विधिवत् सम्मान कर धर्म से धन प्राप्त करने के लिए दिग्विजय करो ॥५१-५२॥ तुम्हारे दो श्वसुरों के सम्बन्ध (मित्रता) के कारण बहुत-से राजा विरोध नहीं करेंगे बल्कि मित्रता रखेंगे ॥५३॥ यह जो वाराणसी (काशी) में ब्रह्मदत्त नाम का राजा है वह तुम्हारे वंश का वैरी है पहले उसी की विजय करो ॥५४॥ उसके जीत लेने पर क्रमशः समूची पूर्व दिशा की विजय करो और शरद् के कुमुद के समान शुद्ध यश को ऊँचा करो—विस्तृत करो ॥५५॥ मुख्यमन्त्री से इस प्रकार कहे गये वत्सराज उदयन ने विजय के लिए तैयार होकर सारे नगर की प्रजा से विजय यात्रा की घोषणा करा दी ॥५६॥ राजा उदयन ने अपने साले और अपने सहायक मारुकंप का उसका सम्मान करने के लिए विदेह (मिथिला) का राज्य दे दिया ॥५७॥ अपनी सेनाओं के साथ सहायता के लिए आये हुए पद्मावती के भाई सिंहवर्मा को सम्मानित करके चेदि-देश का राज्य दे दिया ॥५८॥ तदनन्तर राजा ने सेना से वर्षाकाल के समान अपनी सेनाओं के साथ आए घिरे हुए भिल्लों के राजा पुलिन्दक को बुलवाया ॥५९॥ इस प्रकार राजा के राष्ट्र में विजय-यात्रा की तैयारी हुई और शत्रुओं के हृदय में उत्सुकता उत्पन्न हो गई यह आश्चर्य की बात है ॥६०॥ प्रधानमन्त्री यौगन्धरायण ने राजा ब्रह्मदत्त की कार्यवाही जानने के लिए अपने गुप्तचरों को वाराणसी भेजा ॥६१॥ इस प्रकार सभी तैयारी हो जाने पर विजयोद्यत शकुनों से प्रसन्न राजा उदयन ने शुभ दिन के सवेरे पूर्व दिशा में ब्रह्मदत्त पर चढ़ाई की ॥६२॥ उस समय उदयन की सेना से उड़ती धूल तथा उत्सव से हाथियों के मदजल से भूमि पर कीचड़ का कीचड़ हो जाने पर विचित्र दृश्य दिखलाई देता था ॥६३॥

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