कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ लम्बक ४२५ समय के अनुसार मेरे पति के पिता वह्निदत्त वृद्धावस्था के कारण परलोक सिधार गये और उनकी पत्नी (मेरी सास) उनके साथ सती हो गई॥११० ॥ मेरे पति ने तीर्थयात्रा के उद्देश्य से मुझ गर्भवती को घर पर छोड़कर और पितृशोक से अन्धे होकर सरस्वती नदी के प्रवाह में अपना शरीर-त्याग कर दिया ॥१११॥ उसके साथी अन्यान्य यात्रियों द्वारा उसका समाचार कहने पर गर्भवती होने के कारण मैंने अपने बन्धुओं से सती होने की आज्ञा नहीं प्राप्त की॥११२॥ जब मैं पति के शोक में मग्न ही थी कि एकाएक लुटेरा ने हमारे निवास-स्थान गांव को ही नष्ट किया॥११३॥ उस समय मैं गांव की तीन ब्राह्मणियों के साथ चरित्र नष्ट होने के भय से थोड़े-से वस्त्रों को साथ लेकर घर से भाग गई॥११४॥ अपना देश नष्ट हो जाने पर उन तीनों के साथ दूर देश को चली गई और एक मास तक परिश्रम के कार्य करके जीवन-निर्वाह करती रही॥११५॥ यहाँ आकर यह सुना कि 'वत्स देश के राजा अनाथों की रक्षा करते हैं तो मैं उन ब्राह्मणियों के साथ एकमात्र चरित्र के सहारे यहाँ आ गई॥११६॥ यहाँ आते ही एक साथ दो बालकों को उत्पन्न किया। उस समय वे तीनों ब्राह्मणी सहेलियाँ मेरे साथ थीं॥११७॥ पति का नाश विदेश दरिद्रता और दूना प्रसव आदि—यह सब देखकर भाग्य ने मेरी विपत्तियां का द्वार खोल दिया है॥११८॥ इन दोनों बच्चों के पालन-पोषण के लिए मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं है यह सोचकर, इसीलिए स्त्रियों के भूषण—लज्जा—को छोड़कर मैंने दरबार में आकर वत्सराज से प्रार्थना की। सच है, निरीह शिशुओ की वेदना को कौन सहन कर सकता है॥११ ९२ ॥ उन्हीं की आज्ञा से मैंने तुम्हारे चरणों में स्थान पाया है। फलतः मेरी सारी विपत्तियां मानो राजद्वार से टकराकर पीछे लौट गईं ॥१२१॥ यह मेरा वृत्तान्त है। मेरा नाम पिंगलिका है। बाल्यपन में अग्निहोत्र के धूम से मेरी आंखें पीली हो गईं इसीलिए मेरा नाम पिंगलिका हुआ॥१२२॥ विदेश गया हुआ मेरा देवर शान्तिकर, किस देश में है इसका अभी तक मुझे पता नहीं है॥१२३॥ इस प्रकार अपना वृतान्त कहती हुई उस ब्राह्मणी को कुलीन समझकर रानी प्रेमपूर्वक कहने लगी—॥१२४॥ ५४