भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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चतुर्थ लम्बक ४०५ उसके पश्चात् उसने पात्र के प्रभाव से अनेक कन्याओं के पूर्वजन्म को देखा और पूर्वजन्म की भिन्न-भिन्न जातीय उन कन्याओं को छोड़कर अपने पूर्व जाति के समान सिंह जाति की एक कन्या से उसने विवाह किया। उस स्त्री का नाम सिंहिनी था ॥४८ ४९॥ उस कलहकारिणी स्त्री को केवल भोजन मात्र देकर, खजाना मिलने से सुखी सिंहविक्रम नवीन वधू के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥५०॥ इस कथा को सुनाकर वसन्तक ने कहा—महाराज ! इस प्रकार पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण भी स्त्री पुत्र मित्र आदि इस जन्म में स्नेही या विरोधी हो जाते हैं ॥५१॥ वत्सराज उदयन वसन्तक के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥५२॥ इस प्रकार गर्भवती रानी के मुखचन्द्र को निरन्तर देखते हुए राजा के दिन व्यतीत होने लगे ॥५३॥ मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति इन्हीं दिनों राजा के सभी मन्त्रियों के यहाँ शुभ लक्षणोंवाले पुत्र उत्पन्न हुए, जो भविष्य के लिए कल्याण-प्राप्ति की सूचना देनेवाले थे ॥५४॥ सबसे पहले यौगन्धरायण का मरुभूति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५५॥ तब सेनापति रुमण्वान् का हरिशिख नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और नर्मसचिव वसन्तक का भी तपन्तक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५६॥ तब गिरिपोषित नाम के द्वारपालाध्यक्ष के जिसका दूसरा नाम 'इत्यक' था गोमुख नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७॥ ये सभी बालक विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती एवं बैरियों के वंश का नाश करनेवाले वत्सराज के कुमार के भावी मन्त्री होंगे ॥५८॥ इन बालकों के उत्पन्न होने पर जब महोत्सव मनाये जा रहे थे तब उस समय वहाँ पर आकाश से देववाणी हुई—॥५९॥ 'कुछ ही और दिनों के व्यतीत होने पर वत्सराज की रानी वासवदत्ता का प्रसवकाल भी सन्निकट होगा' ॥६०॥ नरवाहनदत्त का जन्म तब वह रानी आक और शमी के पत्तों से ढँकी हुई खिड़कियोंवाले रत्न-दीपकों की किरणों और शस्त्रास्त्रों की चमक-दमक से आलोकित एवं पुत्रवती सुहागिनों से भरे हुए प्रसूति गृह में रहने लगी ॥६१॥ ९