कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ लम्बक ४०५ वह प्रसूति-गृह मन्त्रियों द्वारा अनेक मन्त्र-तन्त्रों से सुरक्षित किया गया मानों मृगों की रक्षा के लिए और कष्टों के लिए दुर्गम दुर्ग बन गया हो। उस प्रसूति-गृह में रानी ने समय आने पर सुन्दर और दर्शनीय पुत्र को इस प्रकार जन्म दिया जिस प्रकार आकाश स्वच्छ और अमृतमय चन्द्रमा को जन्म देता है ॥६२-६४॥ इस कुमार के जन्म लेने से केवल प्रसूति-गृह ही आलोकित नहीं हुआ प्रत्युत माता का हृदय-गह्वर भी शोक रहित हो प्रसन्नता से आलोकित हो उठा॥६५॥ पुत्र-जन्म से सारे रनिवास में प्रसन्नता की लहर उठ गई और रनिवास के व्यक्ति से ही राजा उदयन ने यह शुभ समाचार सुना ॥६६॥ पुत्र-जन्म का समाचार सुनानेवाले दूत को प्रसन्न राजा ने अपना राज्य साकल्यवत नहीं दिया यह नहीं प्रत्युत अनुचित समझकर ही नहीं दिया ॥६७॥ इस प्रकार, चिरकाल के पश्चात् सफल मनोरथवाले महाराज ने अत्यन्त उत्सुक हृदय से प्रसूति-गृह में जाकर बालक को देखा ॥६८॥ उस बालक का मुख लाल और चौड़े अधरोंवाला ऊन के रेशों के समान सिर के कोमल बालोंवाला और साम्राज्य-लक्ष्मी के लीला-कमल के समान शोभित हो रहा था ॥६९॥ अन्य राजाओं की राज्य-लक्ष्मी ने मानों भय से उसके कोमल चरणों को पहले से ही छत्र और चामर से चिह्नित कर दिया था ॥७० ॥ पुत्र का मुख देखने पर हर्ष की अधिकता से फैली हुई और हर्षाश्रु-धारा बहाती हुई आँखों से प्रतीत होता था कि राजा की पुत्र-स्नेह-वाष्प मानों बह निकली ॥७१॥ उस अवसर पर राजा के परम हितैषी यौगन्धरायण आदि भी अति प्रसन्न हो रहे थे। उसी समय आकाश से इस प्रकार की वाणी हुई—'राजन् तुम्हारा यह पुत्र कामदेव का अवतार है, इसका नाम नरवाहनदत्त होगा। यह वीर एक दिव्य युग तक विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा रहेगा ॥७२-७४॥ ऐसा कहकर वाणी बन्द हो गई। आकाश से पुष्पवर्षा हुई और वाद्यनादों के संगीत फैलने लगे ॥७५॥ देवताओं द्वारा मनाये गये उत्सव से अत्यन्त उत्साहित और प्रसन्न होकर राजा ने अपने विस्तृत राज्य में व्यापक पुत्रजन्म-महोत्सव मनाया ॥७६॥