कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक २१ उन दोनों में बड़ा पुत्र मूर्ख और दरिद्र था। छोटा उपवर्ष इसके विपरीत विद्वान् और धनी हुआ। उस उपवर्ष ने प्रारम्भ में वर्ष के घर की व्यवस्था करने के लिए अपनी पत्नी को नियुक्त किया था॥५५॥ इसी क्रम से रहते हुए एक बार वर्षा-ऋतु आ गई, जिसमें स्त्रियाँ गुड़ के साथ आटे से निर्मित मूषक का रूप बनाकर निन्दनीय रूप से मूर्ख ब्राह्मणों को दान देती हैं। इसी प्रकार शीत और ग्रीष्म-ऋतु में क्रमशः स्नान और पसीने के कष्ट को हरण करने वाली वस्तुएँ दान करती हैं। इस प्रकार के दान को नहीं लिया जाता। यह अत्यन्त कुत्सित आचार है। वह दान तो मेरे देवर की पत्नी ने दक्षिणा-सहित मेरे पति वर्ष को मूर्ख समझकर दिया॥५६, ५७ ५८॥ उसे लेकर जब वे घर आये तो मैंने उन्हें खूब फटकारा। अपनी मूर्खता के कारण होनेवाले सन्ताप से वे अत्यन्त सन्तप्त हुए॥५९॥ इसके पश्चात् वर्ष तपस्या से स्वामी कार्त्तिक को प्रसन्न करने चले गये। प्रसन्न होकर स्वामी कार्त्तिक ने उन्हें वरदान द्वारा समस्त विद्याएँ प्रदान कीं॥६०॥ और स्वामी कार्त्तिक ने आदेश दिया कि एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण को प्राप्त कर तुम इन विद्याओं को प्रकट करना। इस प्रकार कार्त्तिकेय से वरदान प्राप्त कर वर्ष हर्षपूर्वक यहाँ आ गये॥६१॥ वहाँ से आकर उन्होंने समस्त वृत्तान्त मुझे बताया और तभी से वे निरन्तर जप और ध्यान में मग्न रहते हैं॥६२॥ इसलिए आपलोग एक बार ही सुनकर स्मरण रखनेवाले किसी छात्र को ढूँढ़ें। इससे तुम दोनों की मनस्कामना पूर्ण होगी इसमें सन्देह नहीं॥६३॥ वर्ष की पत्नी से इस प्रकार सुनकर हम दोनों ने उसकी तात्कालिक दरिद्रता दूर करने के लिए उसे एक सौ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं और उस नगर से चले गये॥६४॥ तदनन्तर हम दोनों सारी पृथ्वी पर घूमे किन्तु कहीं भी एक श्रुतधर नहीं मिला। अतः थककर आज तुम्हारे घर विश्राम के लिए रुक गये॥६५॥ आज इस बालक को जो तुम्हारा पुत्र है प्राप्त किया। जो श्रुतधर है। तुम इसे हमें दे दो। हमलोग विद्या-दान की सिद्धि के लिए जायें॥६६॥ इस प्रकार व्याडि के वचन सुनकर मेरी माता ने आदर के साथ कहा—यह सब ठीक है। मुझे आपकी बातों पर विश्वास है॥६७॥ और भी कारण है। जब यह एकमात्र पुत्र मुझसे उत्पन्न हुआ था उस समय आकाश से देववाणी हुई थी॥६८॥