कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५८९ 'तुमने अकेले ही सारा मांस क्यों खा लिया मेरे लिए क्यों नहीं रखा ? —शक्तिदेव के इस प्रकार कहते हुए ही वह कुटिल जालपाद विद्याधर बनकर आकाश में उड़ गया ॥२३३॥ आकाश के समान नीले रंग की तलवार लिये हुए और हार, केयूर से सुशोभित जालपाद के उड़ जाने पर देवदत्त सोचने लगा ॥२३४॥ दुःख है कि उस दुष्ट बुद्धि ने मुझे ठगा। सच है अत्यन्त सरलता किसे अपमानित नहीं करती ? ॥२३५॥ तो अब उसके इस अपकार का बदला मैं कैसे लूँ। विद्याधर बने हुए भी इसे किस प्रकार पकड़ लूँ ॥२३६॥ अब इसके लिए बेताल-साधना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है यह मानकर वह रात को श्मशान में गया ॥२३७॥ यहाँ पर एक वृक्ष की जड़ में जाकर मनुष्य के मुख में नरमांस की बलि तथा तर्पण आदि करके उसने बेताल का आवाहन किया ॥२३८॥ उससे भी बेताल को तृप्त होते न देखकर उसकी तृप्ति के लिए वह अपना मांस काटने लगा। तब बेताल उस महान् आत्मावाले देवदत्त से कहने लगा—मैं तुम्हारे इतने ही साहस से प्रसन्न हूँ अब अधिक साहस न करो। तुम अपना अभीष्ट कार्य बताओ मैं उसे तुम्हारे लिए सिद्ध करूँ। बेताल के ऐसा कहने पर वह वीर देवदत्त बोला—विश्वासी व्यक्ति को ठगनेवाला मायक जालपाद जहाँ भी हो उस विद्याधरों के निवास-स्थान में तुम आज के लिए मुझे ले चलो ॥२३९-२४२॥ देवदत्त के ऐसा कहने पर वह बेताल उसी क्षण उसे कन्धे पर चढ़ाकर आकाश-मार्ग से विद्याधरों के लोक को ले गया ॥२४३॥ विद्याधरलोक के राजभवन में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए, विद्याधर-पद प्राप्त करके अभिमान से अन्ध एवं विद्याधरी पद को प्राप्त पत्नी विद्यन्माला को, उसके न चाहते हुए भी विविध प्रकार की बातों से उसे सुखी बनाने की चेष्टा करते हुए उसने जालपाद को देखा ॥२४४-२४५॥