भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ७१७ मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी चौड़ी डींग तो हाँक दी किन्तु ऐसा विज्ञान तो मैं जानती नहीं ॥१३५३॥ अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा प्राणदंड दे सकते हैं ॥१३५४॥ हाँ एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है वह ऐसे कामों में चतुर है। वह कुछ उपाय कर सकता है ॥१३५५॥ ऐसा सोचकर वह भिक्षुणी नापित के पास गई और उसे अपना अर्थलाभ करानेवाली सारी योजनाएँ बताई ॥१३५६॥ तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोचने लगा—'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर मिला है॥१३५७॥ इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए प्रत्युत उसकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि उस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर देगा ॥१३५८॥ इस समय तो उसे राजा से पृथक् करके महारानी का धन खाते हैं क्योंकि रहस्य में सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३५९॥ राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा दूँगा कि जिससे राजा और ऋषिकन्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे। इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी' ऐसा सोचकर वह धूर्त नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा - 'माता मैं यह सब तो कर दूँगा किन्तु किसी उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय तो यह उचित न होगा ॥१४ १४२॥ रहस्य फूट पड़ने पर, राजा हमलोगों को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥१४४३॥ इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक कर दिया जाय तो महारानी भी सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१४४४॥ यह बात तो क्या है? बुद्धि से मैं क्या नहीं कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो मैं कहता हूँ ॥१४४५॥ नाई और राजा की कथा इस राजा दृढवर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और उसका क्षौर कर्म किया करता था ॥१४४६॥ किसी समय इस ओर घूमते हुए उसने मेरी स्त्री को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की ओर उसका मन खिंच गया ॥१४४७॥ ९१