कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७५९ यह बात प्रसिद्ध है कि तपस्या में बैठे हुए अर्जुन ने हठपूर्वक आई हुई रम्भा को दूर कर दिया था और उसने अर्जुन को षण्ढ (नपुंसक) होने का शाप दिया था ॥९१॥ उस शाप के समय को अर्जुन ने आश्चर्यमय रूप से स्त्रीवेष धारण करके विराट् के भवन में व्यतीत किया था ॥९२॥ इसीलिए मैंने उसी समय कलिङ्गसेना का निषेध नहीं किया क्योंकि तुम्हारी इच्छा के बिना कुछ भी कहने का साहस नहीं कर सकता' ॥९२॥ इस प्रकार आश्वासन देकर मानो प्रेमपूर्ण हृदय के समान उसके मुंह में लगाये हुए मद्य से उसके दृष्ट भाव को समझकर मुख्यमन्त्री की प्रौढ़ बुद्धि से सन्तुष्ट राजा उस दिन रात को वासवदत्ता के साथ वहीं रह गया ॥९३-९४॥ इसी बीच यौगन्धरायण ने कलिङ्गसेना का समाचार जानने के लिए जिसे दिन-रात के लिए नियुक्त किया था वह योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस उसी रात को यौगन्धरायण के पास आया और कहने लगा— मैं कलिङ्गसेना के भवन में बाहर और भीतर सदा उपस्थित रहता हूँ किन्तु वहाँ दिव्य या मानव किसी भी व्यक्ति का आगमन मैंने नहीं देखा ॥९५-९७॥ आज छिपे हुए मैंने भवन की ऊपरी छत के पास सायंकाल के समय आकाश में अकस्मात् शब्द सुना ॥९८॥ उस शब्द की उत्पत्ति का स्थान जानने के लिए मैंने अपनी विद्या का प्रयोग भी किया किन्तु विद्या का कुछ प्रभाव न देखकर मैंने सोचा कि निश्चय ही कलिङ्गसेना के लावण्यलोभी किसी दिव्य प्रभाववाले आकाशचारी व्यक्ति का यह शब्द है ॥ ९९ ॥ इसीलिए मेरी विद्या काम नहीं कर रही है क्योंकि सावधान और चतुर व्यक्ति के लिए दूसरे का छिद्र दुष्प्राप्य नहीं होता ॥१००॥ यह कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों में चाही जा रही है यह बात (मन्त्रिवर) आपने भी कही थी और मैंने भी उसकी सखी सोमप्रभा को ऐसा कहते हुए सुना है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके मैं आपको कहने के लिए यहाँ आया हूँ और प्रसंगवश मैं यह पूछता हूँ बताइए ॥१०२॥ आपकी आज्ञा से यह कहते हुए मैंने छिपकर सुन लिया कि पद्मावती भी अपनी रक्षा करके ॥१०३॥