भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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षष्ठ लम्बक ४१७ यहाँ आकर शिरःपीड़ा का बहाना करके द्वारपाल द्वारा नगाड़े पर घोषणा कराकर राजा ने नगर के सभी वैद्यों को बुलवाया ॥१४८॥ और, एक-एक वैद्य को अलग-अलग बुलवाकर पूछने लगा कि तुम्हारे कितने रोगी हैं और तुमने किसे-किसे कौन-कौन-सी दवा दी है? ॥१४९॥ उन वैद्यों ने भी एक-एक करके अपना-अपना विवरण राजा को सुनाया। उनमें से एक वैद्य ने क्रमशः अपनी बारी आने पर राजा से यह कहा ॥१५०॥ 'महाराज रोगी मातुलत्त नामक वैश्य को मैंने नागबला नाम की औषधि बताई थी आज दूसरा दिन है। यह सुनकर राजा ने मातुलत्त वैश्य को बुलवाकर कहा-'तुम्हारे लिए नागबला कौन लाया था? बताओ' ॥१५१-१५२॥ 'महाराज मेरा भृत्य (नौकर) लाया था। बनिये के ऐसा उत्तर देने पर राजा ने उस भृत्य को बुलवाकर कहा 'तू ने नागबला के लिए भूमि खोदते हुए जो मुहरों की राशि प्राप्त की है वह ब्राह्मण का धन है, उसे दे दे' ॥१५३-१५४॥ राजा के ऐसा कहने पर भयभीत नौकर ने उसी समय मुहरें लाकर वहीं रख दीं ॥१५५॥ तदनन्तर राजा ने अनुग्रह करते हुए ब्राह्मण को बुलवाकर, उस कंजूस ब्राह्मण के बाहरी प्राणों के समान चोरी होकर मिली हुई मुहरें उसे दे दीं ॥१५६॥ इस प्रकार राजा ने वृक्ष के नीचे से ले जाये गये धन को बुद्धिबल से ब्राह्मण को प्राप्त करा दिया, क्योंकि वहाँ उत्पन्न हुई ओषधि का वह जानता था ॥१५७॥ अतएव पुरुषार्थ के ऊपर सदा बुद्धि की प्रधानता रहती है। शुभ कार्यों में पौरुष क्या कर सकता है? ॥१५८॥ इसलिए हे प्राणेश्वर ! तुम भी बुद्धिबल से कुछ ऐसा करना जिससे कलिङ्गसेना का सोच दोष टाला जा सके ॥१५९॥ यह बात तो है कि उस कलिङ्गसेना पर दया और मधुर संगीतकला दोनों हैं और रात में तुमने ऐसा कुछ शब्द भी सुना है ॥१६०॥ उसका दोष मिलने पर उसका और हमारा कल्याण न होगा। राजा आगे विवाह न करेगा इसलिए अधर्म भी नहीं होगा ॥१६१॥ उधर बन्दिवाले यौगन्धरायण के पद सुनकर वत्सनरेश दोषदण्ड उत्तप्त होकर बोला-॥१६२॥