कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ४७५ इस प्रकार मन्त्री के राजा के साथ चले जाने पर अपने बन्धु-बान्धवों से छूटी हुई और वियोग में पड़ी हुई कलिङ्गसेना झुंड से बिछुड़ी हुई हरिणी के समान हाथी के पैरों से रौंदी हुई कमलिनी के समान मलिन मुखवाली भ्रमरों से घिरी हुई कमलिनी के समान बिखरे हुए केशोंवाली और कौमार के नष्ट होने से मलिन एवं निष्प्रभा कलिङ्गसेना आकाश की ओर देखती हुई यह कहने लगी—॥२०७-२१०॥ 'वत्सराज का रूप धारण करके जिसने मुझे विवाहित किया है वह मेरे कौमार का हरण करनेवाला प्रकट हो। वही मेरा पति है' ॥२११ ॥ उसके ऐसा कहते ही वह विद्याधरों का राजा मदनवेग हार और केयूर पहने हुए दिव्य रूप से उतरकर आया ॥२११॥ 'तुम कौन हो ?' कलिङ्गसेना के इस प्रकार पूछने पर मदनवेग ने उससे कहा— 'हे सुन्दरि ! मैं मदनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मैंने तुझे पहले ही तेरे पिता के घर में देखा था और तुम्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या करके शिवजी से वर पाया है ॥२१२-२१३॥ तू वत्सराज पर आसक्त थी इसलिए मैंने शीघ्र ही उससे विवाह होने के पूर्व उपाय करके तुझे विवाहित कर लिया है ॥२१४॥ मदनवेग की ऐसी वाणी-रूपी अमृतधारा ने कानों के मार्ग से कलिङ्गसेना के हृदय में प्रवेश कर उसके हृदय-कमल को प्रफुल्लित और विकसित कर दिया ॥२१५॥ तदनन्तर वह मदनवेग उस अपनी प्यारी पत्नी को धीरज बँधाकर और उसे स्वर्ण की प्रचुर राशि प्रदान कर, 'यह भी अच्छा ही हुआ ऐसा सोचती हुई और हृदय में पति भक्ति को प्रतिष्ठित करती हुई कलिङ्गसेना से पूछकर वह आकाश में उड़ गया ॥२१६॥ [L21: अपने पति का स्थान दैवी है मनुष्य द्वारा जानने योग्य नहीं है अपने पिता का घर कल का छोड़ दिया'—ऐसा सोचकर कलिङ्गसेना ने मन्दनवेग की अनुमति प्राप्त कर उसी के पास रहने का विचार स्थिर किया ॥२१७॥ सप्तम तरङ्ग समाप्त ।