कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७४७ अष्टम तरंग वत्सराज की कथा (अनुक्रमशः) एक बार रात के समय वत्सराज उदयन कलिङ्गसेना के अनुपम सौन्दर्य का स्मरण करके कामावेश से क्षुब्ध (उत्तेजित) हो गया ॥१॥ और नग्नकर हाथ में नंगी तलवार लिये अकेले ही उसके भवन में गया। कलिङ्गसेना ने आदर-सत्कार के साथ उसका स्वागत किया ॥२॥ तब राजा ने उससे पत्नी बनने की प्रार्थना की। उत्तर में कलिङ्गसेना ने कहा—'अब मैं दूसरे की पत्नी हो गई हूँ'—ऐसा कहकर उसे रोक दिया ॥३॥ 'तू तीसरे पुरुष के पात्र बनी गई इसलिए व्यभिचारिणी हो गई। अतः तेरा समागम करने में कोई दोष नहीं' वत्सराज ने कहा ॥४॥ राजा के इस प्रकार कहने पर कलिङ्गसेना ने कहा—'हे राजन् ! मैं तुम्हारे लिए यहाँ आ गई किन्तु तुम्हारा रूप धारण करनेवाले मदनवेग नामक विद्याधर ने गुप्त रूप से मेरे साथ विवाह कर लिया। वही मेरा एक पति है अब मैं व्यभिचारिणी कैसे हुई ॥५, ६॥ अपने सम्बन्धियों का परित्याग कर स्वेच्छाचार से आत्मदान करनेवाली स्त्रियों के लिए यदि ये विरतियां हैं तो कुमारी कन्याओं की तो बात ही क्या ? ॥७॥ आयुध को जाननेवाली मद्वेणी द्वारा रोके जाने पर भी मैंने तुम्हारे पास जो दूत भेजा उसी का यह परिणाम है ॥८॥ लेकिन यदि बलात्पूर्वक ऐसा स्पर्श करोगे तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। कौन कुलीन स्त्री पति के साथ द्रोह (विश्वासघात) करेगी ॥९॥ पतिव्रता बन्धुमती की कथा इस विषय पर मुझसे एक कथा कहती हूँ सुनो— पहले समय में चेदि देश का राजा दृढवर्मा था ॥१०॥ उस राजा ने शरीर को क्षणभंगुर समझकर एवं उसी शरीर की रक्षा के लिए पारलौकिक आनन्द में से ही कुछ सदा एक देवमन्दिर बनवाया ॥११॥ एक बार वह राजा मन्दिर की सीढ़ियों से युक्त मन्दिर को देखने के लिए वहाँ गया। वहाँ पर तीर्थाटन के लिए पूज्य सभी अन्य आये हुए थे ॥१२॥ तब उस राजा ने नीचे जल के लिए आयी हुई एक वीणाभट को देखा, जिसका सौन्दर्य रूपमद के निमित्त कुसुम (कन्या) से था । १३ । ८