कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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२१४ कथासरित्सागर एवं च स प्रतिदिनं परिवर्धमानो निर्वर्त्यते स्म सुचिरेण महोत्सवोऽत्र। सर्वः सदैव च सुहृत्स्वजनो जनश्च हृष्टस्ततः किमपि पूर्णमनोरथाऽभूत् ॥२६४॥ स च नरवाहनदत्तो युवराजो मदनमञ्चुकासहितः। भजते स्म सुचिरकांक्षितमुदयेऽपि जीवलोकसुखम् ॥२६५॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बकेऽष्टमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं मदनमञ्चुकालम्बकः षष्ठः।