कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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गोमुख ने वत्सराज को इस प्रकार कथा सुनाकर कहा—'अब फिर और कुछ मूर्खों की कथाएँ सुनो ।।१३१।। कहीं पर किसी बौद्धमठ (विहार) में एक मूर्ख भिक्षु रहता था। गलियों में भिक्षार्थ घूमते हुए किसी समय एक कुत्ते ने घुटने में काट लिया था ।।१३२।। कुत्ते का काटा हुआ वह मूर्ख अपने मठ में आकर सोचने लगा कि मेरे घुटने में पट्टी बँधी देखकर प्रत्येक भिक्षु मुझसे पूछेगा कि 'तेरे घुटने में क्या हो गया ? ।।१३३।। इस प्रकार मैं कितनों को कितने समय तक बताता रहूँगा । इसलिए, सब को एक बार ही अपना हाल बताने का उपाय करता हूँ ।।१३४।। ऐसा सोचकर और मठ की छत पर चढ़कर घड़ियाल बजाने का मूसल लेकर उसने उसे बजा दिया। बिना कारण असमय में यह घड़ियाल क्यों बजाता है, यह सुनकर सभी भिक्षु आश्चर्य के साथ वहाँ एकत्र हो गये और उससे घंटा बजाने का कारण पूछने लगे ।।१३५-१३६।। 'मेरे घुटने में कुत्ते ने काट लिया है' इस बात को एक-एक करके मैं कबतक और कितनों को बताता रहूँगा । यही एक बार बताने के लिए मैंने आपलोगों को यहाँ एकत्र किया है' ।।१३७।। 'इस बात को आप सब लोग जान लें और मेरे घुटने को देख लें भिक्षुओं' का ऐसा कहकर उसने अपना घुटना सबको दिखा दिया । तब वे सब भिक्षु पेट पकड़कर हँसने लगे कि इतनी-सी बात के लिए इसने कितना प्रपंच रचा ।।१३८-१३९।।
मूर्ख टक्क की कथा मूर्ख श्रमण की कथा सुनी अब एक मूर्ख टक्क की कथा सुनो। किसी स्थान पर एक अत्यन्त कंजूस टक्क रहता था जो बहुत धनी था ।।१४० ।। वह अपनी पत्नी के साथ सदा बिना नमक का सत्तू खाता था उसने सत्तू के सिवाय दूसरे अन्न का कभी स्वाद भी नहीं जाना ।।१४१।। एक बार ईश्वर की प्रेरणा से उसने अपनी पत्नी से कहा— 'आज मेरा मन खीर खाने को है । इसलिए आज तुम खीर पकाओ' ।।१४२।। 'ठीक है' कहकर उसकी पत्नी खीर पकाने लगी और वह मूर्ख घर के भीतर खाट पर जाकर पड़ गया कि मुझे बाहर बैठा देखकर कोई मेहमान न आ जाय । इतने में ही उसका एक मित्र धूर्त टक्क आ गया ।।१४३॥-१४४।।
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