कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश लम्बक ९६३ जब वह मूर्ख डाल पकड़कर झूल ही रहा था कि इतने में उस मार्ग से नदी में पानी पीकर एक हाथी लौट रहा था। उस पर महावत भी बैठा था। उसे देखकर पेड़ की डाल में लटकता हुआ मूर्ख शीघ्रतापूर्वक हाथीवान से बोला 'महात्मा मुझे पकड़ लो' ॥२४-२५॥ महावत ने भी उसे वृक्ष से उतारने के लिए, अंकुश को रखकर, दोनों हाथो से उसके दोनो पैर पकड़ लिये ॥२६॥ इतने में ही हाथी के आगे निकल जाने पर महावत भी पेड़ की डाल में झूलते हुए उस मूर्ख के पैरों में लटक गया ॥२७॥ तब डाल में लटका हुआ वह मूर्ख शीघ्रतापूर्वक महावत से बोला कि 'यदि तू गाना जानता है, तो गा' ॥२८॥ इसलिए यह सम्भव है कि कोई गाना सुनकर यहाँ आवे और हम दोनों को उतार ले ॥२९॥ इस प्रकार, उसके कहने पर महावत ने इतना अच्छा गीत गाया कि वह लटका हुआ मूर्ख अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया ॥३०॥ और उसे वाहवाही देता हुआ यह भूल गया कि मैं लटका हूँ, इसलिए उस मूर्ख ने अपने दोनों हाथों से चुटकी बजाना प्रारम्भ किया ॥३१॥ इस प्रकार चुटकी बजाने के चक्कर में डाल छूट जाने के कारण वह मूर्ख महावत के साथ ही गिरकर नदी में डूब गया। सच है कि मूर्खों का साथ किसके लिए हानिकारक नहीं होता ॥३२॥ नरवाहनदत्त को यह कथा सुनाकर गोमुख ने उसे हिरण्याक्ष की कथा सुनाई ॥३३॥ हिरण्याक्ष की कथा हिमालय के मध्य में पृथ्वी का शिरोमणि कश्मीर नाम का देश है, जो विद्या एवं धर्म का घर है। उस देश में हिरण्यपुर नाम का एक राज्य था जिसका राजा कनकप्रभ नाम से प्रसिद्ध था। रत्नप्रभा नाम की उसकी रानी से शिवजी की आराधना के फलस्वरूप एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम हिरण्याक्ष रखा गया। ॥३४-३६॥ वह बालक कभी गोलियाँ खेल रहा था। उसने किसी बहाने से मार्ग में जाती हुई एक तपस्विनी को गोली से मारा। क्रोध न करनेवाली क्षमाशील तपस्विनी यशोधेश्वरी ने मुँह बिगाड़ बिचकाकर राजकुमार से कहा— 'यदि तुझे अपने यौवन आदि पर इतना घमंड है तो मृगांक- लेखा को अपनी पत्नी बना लेने पर तुम्हारा घमंड कितना न बढ़ जाय' ॥३७-३९॥