भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक १९९ तब उस प्रौढ़ा तापसी ने मृगांकलेखा से कहा कि 'तू विवाह की सिद्धि के लिए सब कुछ पिता से जाकर कह' ॥२४९॥ तब लाज से अधोमुखी मृगांकलेखा ने अपनी सखी के मुंह से यह सब वृत्तान्त अपने पिता को उसी समय बता दिया ॥२५० ॥ स्वप्न में पहले ही पार्वती द्वारा आज्ञापित उसका पिता अमृततेज को सम्मानित कर अपने घर ले आया ॥२५१॥ और, उसके लिए उसने मृगांकलेखा को विधिपूर्वक प्रदान कर दिया। विवाह के अनन्तर वह अमृततेज को अपने वज्रकूट नगर ले गया। तब अमृततेज ने अपनी पूर्व पत्नी के साथ अपने राज्य को प्राप्त कर, मनुष्य होने के कारण सिद्ध तापसी द्वारा अपने पिता कनकप्रभ को बुलवाकर और उसका सम्मान करने के उपरान्त विविध भोगों के साथ उसे पृथ्वी पर पहुँचाकर वह मृगांकलेखा के साथ चिरकाल तक अपने राज्य को भोगता रहा ॥२५२-२५४॥ इस प्रकार, पूर्वजन्म के कर्मों से जिस प्राणी का जो भवितव्य होता है वह बिना प्रयत्न किये ही असाध्य होने पर भी स्वयं सामने आकर मिलता है॥२५५॥ शक्तिप्रभा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त गोमुख द्वारा कही गई इस कथा को सुनकर सेज पर पड़ा-पड़ा नींद में सो गया ॥२५६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तिप्रभ लम्बक का नवम तरंग समाप्त दशम तरंग तब दूसरे दिन फिर रात में मनोरंजन के लिए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त के लिए यह कथा सुनाई ॥१॥ प्राचीन समय में शारदेश्वर नामक शिव-क्षेत्र में बहुत-से शिष्यों द्वारा सेवित एक महामुनि रहता था ॥२॥ किसी समय उस मुनि ने अपने शिष्यों से कहा—'तुम लोगों में से किसी ने कोई अपूर्व कुछ देखा या सुना हो तो बताओ ॥३॥ मुनि के ऐसा कहने पर एक शिष्य बोला—'मैंने जो कुछ नया सुना है उसे कहता हूँ सुनिए' ॥४॥ १२२