भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[page_top] दशम लम्बक ९७१ [/page_top]

कश्मीर देश में विजय नाम का विशाल शिव-क्षेत्र है। उस क्षेत्र में एक विद्याभिमानी संन्यासी था ॥५॥ एकबार वह संन्यासी 'मैं सब स्थानों पर विजयी होऊँ' ऐसी कामना करता हुआ शिवजी को प्रणाम करके शास्त्र-वाद (शास्त्रार्थ) के लिए पाटलिपुत्र की ओर चला ॥६॥ रास्ते में असंख्य नदियां और पहाड़ों को लांघता हुआ वह एक सूनसान वन में पहुँचकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥७॥ कुछ ही समय के पश्चात् बावली से पीठक उस स्थान पर उसने लम्बी यात्रा के कारण धूल से भरे, सांग और कुंडी हाथ में लिये हुए एक धार्मिक पुरुष को देखा ॥८॥ उसके वहाँ बैठ जाने पर उस संन्यासी ने उससे पूछा—'तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? तब उस धार्मिक ने उत्तर दिया— ॥९॥ 'भाई, मैं विद्या के केन्द्र पाटलिपुत्र से आ रहा हूँ और कश्मीर के विद्वानों को शास्त्रार्थ में जीतने के लिए वहाँ जा रहा हूँ' ॥१०॥ उस धार्मिक की बात सुनकर वह साधु सोचने लगा कि यहीं पर मैंने यदि इसी एक पाटलिपुत्रवाले को शास्त्रार्थ में न जीत लिया तो पाटलिपुत्र जाकर अन्य बहुतों को कैसे जीतूँगा ऐसा सोचकर उस साधु ने उस धार्मिक पर आक्षेप करते हुए कहा—॥११-१२॥ 'हे धर्मशील तुम्हारा यह विपरीत विचार कैसे हुआ ? कहाँ तो तू मुक्ति चाहनेवाला धर्मशील व्यक्ति और कहाँ रागद्वेष आदि व्यसनों से युक्त शास्त्रार्थी ॥१३॥ शास्त्रार्थ के अभिमान-रूपी बन्धन से तू संसार में मुक्ति चाहता है। तेरी यह युक्ति अग्नि से गरमी को और हिम से सरदी को शान्त करने के प्रयत्न के समान है। इस प्रकार अरे मूर्ख तू पत्थर की नाव से समुद्र पार करना चाहता है और जल की मन्थि को वायु से शान्त करना चाहता है ॥१४-१५॥ ब्राह्मण का स्वाभाविक धर्म क्षमा है और क्षत्रिय का धर्म शरणागत की रक्षा करना। मुमुक्षु (मोक्ष चाहनेवाले) का धर्म शान्ति है और राजर्षियों का धर्म कलह है ॥१६॥ इसलिए मोक्षार्थी को शान्त और दान्त (संयमी) होना चाहिए। रागद्वेष के दुःख को दूर करना चाहिए और सांसारिक कथाओं से डरना चाहिए ॥१७॥ इसलिए धर्म-रूपी कुठार से इस संसार-रूपी वृक्ष को काटो। उस विपरीत विवाद-रूपी अभिमान के जल का सिंचन न हो ॥१८॥ उस साधु से इस प्रकार कहा गया वह धार्मिक सन्तुष्ट हुआ। उसे प्रणाम करके 'आप मेरे उपदेष्टा गुरु हैं' ऐसा कहकर पीछे की ओर लौट गया ॥१९॥