भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक १९१ एकबार उस राजपुत्री के आश्रम में एक बालम ब्रह्मचारिणी सन्यासिनी विचरन करती हुई आ पहुँची ॥१५५॥ हेमप्रभा से समुचित आतिथ्य-सत्कार प्राप्त कर अपनी कथा के मध्य में सन्यास का कारण पूछे जाने पर वह बाल-सन्यासिनी बोली—॥१५६॥ मैं अपने कन्यापन में अपने पिता के पैर दबा रही थी। साँझ में निद्रा भर आने के कारण मेरे दोनों हाथ शिथिल हो गये ॥१५७॥ 'क्या सो रही है?' ऐसा कहकर पिता ने पैर से मुझे ठोकर मारी। उसी क्रोध से मैं घर से निकलकर सन्यासिनी हो गई' ॥१५८॥ इस प्रकार कहती हुई सन्यासिनी से हेमप्रभा ने अपने समान स्वभाव और चरित्र से प्रसन्न होकर उसे अपनी वनवास की सखी बना लिया ॥१५९॥ एकबार हेमप्रभा ने प्रातःकाल उस सन्यासिनी सखी से कहा—'सखि आज मैंने स्वप्न में देखा कि 'मैं एक विशाल नदी को पार कर गई। उसे पार कर श्वेत हाथी पर चढ़ी और उसके पश्चात् पर्वत पर। उस पर्वत पर एक आश्रम में भगवान् अम्बिकापति शिव को देखा। उनके सामने गाती हुई मैंने वीणा बजाई। तब एक दिव्य पुरुष को अपने पास आया हुआ देखा। उसे देखने पर मैं तेरे साथ आकाश में उड़ गई। इतना देखकर मेरी नींद खुल गई और रात्रि भी व्यतीत हो गई' ॥१६०–१६३॥ यह सुनकर वह सखी हेमप्रभा से बोली—'हे कल्याणी यह निश्चय है कि तू शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण कोई दिव्य स्त्री है और तेरे शाप का अन्त भी समीप है। यह स्वप्न यही कहता है। यह सुनकर राजपुत्री ने उसकी बात का समर्थन किया ॥१६४-१६५॥ तदनन्तर, जगत् के दीपक भगवान् भास्कर के पर्याप्त ऊपर आ जाने पर घोड़े पर चढ़ा हुआ कोई राजकुमार उस आश्रम में आया ॥१६६॥ यहाँ तपस्विनी के वेष में राजपुत्री को देखकर उसे उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई। और उसने वाहन को छोड़कर उसे प्रणाम किया ॥१६७॥ राजपुत्री ने भी उसका आतिथ्य सत्कार किया और उसे आसन दिया। आसन पर बैठे हुए उसकी ओर आकृष्ट होकर प्रेम से उसने पूछा कि आप कौन हैं? ॥१६८॥ तदनन्तर, उस राजपुत्र ने कहा—'हे महाभाग्यशालिनी शुभ नाम और चरित्रवाला प्रतापसेन नाम का एक राजा है ॥१६९॥