कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश लम्बक १७ ओह् ! यह मेरी प्राणप्यारी के समान है या सम्भवतः वही हो। किन्तु, यह कैसे होगा ? मेरा ऐसा भाग्य कहाँ ॥६७॥ मैं इस प्रकार सोच ही रहा था कि इतने में प्रसन्नता से बार-बार फड़कती हुई दाहिनी आँख ने कहा—'यह वही है' ? ॥६८॥ हे कृशांगी महलों में रहने योग्य तू इस जंगल में कौन है ? मुझसे इस प्रकार पूछी गई उस बाला ने कुछ न कहा ॥६९॥ तब मैं मुनि के शाप के भय से लता-गुल्म से छिपकर खड़ा हुआ उसे अतृप्त नेत्रों से देखता रह गया ॥७०॥ वह सुन्दरी पूजन करने के उपरान्त घूम करके स्नेहपूर्वक मुझे देखती हुई और कुछ सोचती हुई धीरे-धीरे चल पड़ी ॥७१॥ उसके चले जाने पर मेरे लिए चारों ओर अँधेरा हो जाने पर मेरी दशा रात्रि में चकवे के समान अवर्णनीय थी ॥७२॥ कुछ समय के पश्चात् निष्पाप आती हुई, तेज से सूर्य के समान चमकती हुई, मतङ्ग मुनि की बाल-ब्रह्मचारिणी सुवर्णसमा पुत्री यमुना नाम की उनकी सखी को मूर्त्तिमती धृति (धैर्य) के रूप में मैंने देखा ॥७३-७४॥ वह मुझे स्वस्थ करके कहने लगी— हे चन्द्रसार, धीरज धर के सुन। दूसर द्वीप में दिगंबर नाम का महान् वैश्य है ॥७५॥ उसकी रूपवती पत्नी में कन्या उत्पन्न होने पर जितरक्षित नामक विज्ञानी भिक्षु ने अपने मित्र दिगंबर से कहा—॥७६॥ हे दिगंबर यह कन्या तुम्हारी माता की है। इसे तुम स्वयं किसी को दान न करना। स्वयं दान करने से पाप होगा यही तेरे लिए हित है ॥७७॥ भिक्षु के इस प्रकार कहने पर उस वैश्य दिगंबर ने तुम्हारे द्वारा मांगी गई उस कन्या का उसके मामा के हाथ से दान कराने की इच्छा की ॥७८॥ तब उसने उसे नाव द्वारा सिंहल द्वीप में उसके मामा के पास भेज दिया। किन्तु, वह नाव भीषण तूफान के कारण समुद्र में डूब गई ॥७९॥ नाव के डूबने पर भी आयु शेष रहने के कारण भाग्य ने मङ्गरा के साथ इस समुद्र-तट पर ला पटका ॥८०॥ इसी अवसर पर मेरे पिता मतङ्ग मुनि अपने शिष्यों के साथ समुद्र में स्नान करने के लिए उतरे और डूबती पड़ी हुई इस कन्या का उद्धार किया॥८१॥