कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश लम्बक १ १३ इस प्रकार, उस वैश्य चन्द्रसार के अपना वृत्तान्त कहकर और प्रणाम करके चले जाने पर वह रुचिरदेव नरवाहनदत्त की महिमा को जानकर अत्यन्त हर्षित हुआ और उसके प्रति और अधिक नम्र हो गया ॥११२॥ साथ ही रुचिरदेव ने प्रेम से वश मे किये गये नरवाहनदत्त के लिए, हथिनौ और घोड़ा की जोड़ी के साथ अपनी बहन जयन्द्रसेना को प्रदान किया जिसे वह पहले ही देना चाहता था ॥११३॥ तदनन्तर, नरवाहनदत्त रुचिरदेव से मिलकर घोड़े और हथिनौ के साथ उसकी बहन जयन्द्रसेना को लेकर अपनी नगरी कौशाम्बी लौट आया ॥११४॥ और, अपने पिता वत्सराज तथा मदनमंचुका आदि पत्नियों के साथ वह नरवाहनदत्त अपनी नगरी में सुखपूर्वक रहन लगा ॥११५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के वेला-लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त एकादश वेला-लम्बक समाप्त