भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे प्रस्तुत है:

सप्तम लम्बक १९ उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से जाते हुए किसी ज्ञानी भिक्षु ने कहा—'हे राजकुमारो ! यह बगुला नहीं है। बगुले के रूप में नगरों का नाश करता हुआ यह अग्निमुख नामका राक्षस है ॥५९०॥ अतः इसे बाण से बींध दो जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय। इसपर से ऐसा सुनकर उन निशान्तके राजकुमारों ने उसपर अपने-अपने तीर चलाये फिर भी बगुला नहीं मरा। तब वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला—'तुम लोगों का छोटा भाई शृङ्गभुज बगुले को मार सकता है इसलिए यह एक अच्छा धनुष ले ॥५९१-९२॥ उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्भासभुज माँ की बातों को यादकर और उस अवसर का उपयुक्त समझकर सोचने लगा—॥५९४॥ कि यह अवसर है शृङ्गभुज को यहाँ से निकालने का। अतः इसे पिता का धनुष-बाण देते हैं ॥५९५॥ उसके सुलक्ष्य बाण से बींधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा तो यह भी उस बाण को लाने के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥५९६॥ और जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा तो लज्जा और दण्डाच्छन्न यहाँ न आकर इधर उधर घूमता रहेगा ॥५९७॥ ऐसा सोचकर उस पापी निर्भासभुज ने बगुले को मारने के लिए शृङ्गभुज को पिता के धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥५९८॥ उसे लेकर बलवान् शृङ्गभुज ने रत्नाक्त पंखवाले उस सुवर्णजड़ बाण से बगुले को बींध दिया ॥५९९॥ बाण से बिंधा हुआ बगुला शरीर में चुभे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता हुआ वहाँ से उड़कर भागा ॥६००॥ तब वह दुष्ट निर्भासभुज और अन्य प्रदीप राजकुमार उस वीर शृङ्गभुज से बोले—॥६०१॥ 'हमारे उस किसीके भी न छूटने योग्य बाण को लाओ नहीं तो हम सब लोग सामने ही शरीर का हनन कर देंगे ॥६०२॥ क्योंकि उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता ॥६०३॥