भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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इसलिए, मुझे उसे प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना पड़ेगा। ऐसा कहकर घोड़े पर चढ़ कर युवराज आगे चल पड़ा ॥२७॥ वह गोमुख न चाहता हुआ भी उसके पीछे चल पड़ा। कहना न माननेवाले स्वामी का भी सेवकों को विवश होकर अनुगमन करना ही चाहिए ॥२८॥ उधर वत्सराज भी शिकार खेलकर अपनी नगरी को लौटा। वह समझ रहा था कि सेना आदि के मध्य युवराज भी आया होगा। नगरी में पहुँचकर महल पर जब युवराज का पता नहीं चला। तब वे उदयन आदि सब रत्नप्रभा के समीप गये ॥ २९॥ पहले तो रत्नप्रभा भी व्याकुल हुई किन्तु अपनी विद्या में ध्यान देकर उसके द्वारा अपने प्रिय का समाचार जानकर व्याकुल श्वशुर से बोली ॥३०॥ वन में किसी तपस्विनी द्वारा कर्पूरिका नाम की राजकुमारी का पता पाकर आर्यपुत्र उसे प्राप्त करने के लिए कर्पूरसम्भव नामक नगर में गये हैं, इसलिए आप लोग चिन्ता न करें। यह मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से जाना है ॥३१-३४॥ ऐसा कहकर रत्नप्रभा ने परिवार-सहित वत्सराज को शान्ति प्रदान की ॥३५॥ और फिर, रत्नप्रभा ने दूसरी विद्या का प्रयोग किया कि मार्ग में नरवाहनदत्त को किसी प्रकार का कष्ट न हो। पति का हित चाहनेवाली अच्छी स्त्रियाँ ईर्ष्या को हृदय में स्थान नहीं देतीं ॥३६॥ इधर काठ की पीठ पर बैठा हुआ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जंगल का बहुत-सा मार्ग पार कर गया ॥३७॥ तब अकस्मात् ही मार्ग में एक कुमारी ने आकर कहा—मैं मातङ्गी नाम की विद्या हूँ। रत्नप्रभा द्वारा प्रेषित हूँ। मार्ग में अङ्गारक से तुम्हारी रक्षा करनी है। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। ऐसा कहकर वह विद्या उसके देखते-देखते ही अदृश्य हो गई ॥३८-३९॥ तब उस विद्या के प्रभाव से अन्धकार में रविनगर के लिए चल पड़ा और रत्नप्रभा की प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त आगे चला ॥४०॥ सायंकाल वन में एक निर्मल तालाब दिखा। वहाँ नरवाहनदत्त ने गोमुख के साथ उतर कर आह्निक शौचेन्द्रादि का आहार कर सन्ध्यावन्दनादि किया ॥४१॥