भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक १७३ ऐसा सोचते हुए उन दोनों दुःखित भाइयों ने पिता के पूर्व उपदेश का स्मरण करके माता अम्बिका का ध्यान किया ॥१ १॥ भक्तों को शरण देनेवाली माता के स्मरण से वे दोनों भूख-प्यास से रहित और बलवान् हो गये ॥१ २॥ इस प्रकार, माता के चमत्कार से कुछ आशा प्राप्त करके मार्ग न जानते हुए भी वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी की ओर चल पड़े ॥१ ३॥ वहाँ पहुँचकर वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी को प्रसन्न करने के लिए उसके सन्मुख निराहार रहकर कठोर तप करने लगे। उधर सेना के अधिकारी जब राजा के आज्ञानुसार राजकुमारों को मारने के लिए एकत्र होकर आये तब उन्होंने बहुत खोजने पर भी उन राजकुमारों को नहीं देखा और समझ गये कि वे दोनों अपने बूढ़े नाना के साथ शिबिर से कहीं भाग गये ॥१ ४-१ ६॥ वे सब गुप्त वार्ता के प्रकट हो जाने के कारण घबराये हुए राजा परित्यागसेन के समीप डरते-डरते आये ॥१ ७॥ और, राजा को उसके लेख दिखाकर सब समाचार सुना दिया। राजा यह सब सुनकर और समझकर क्रोध करके उनसे बोला—'ये लेखपत्र आदि मेरे भेजे हुए नहीं हैं। यह क्या इन्द्रजाल है? मूर्ख तुम क्या यह नहीं जानते थे कि कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त किए हुए बच्चों को मैं स्वयं कैसे मारता? तुम लोगों ने तो उन्हें मार ही डाला था। केवल अपने पुण्य से वे बच गये हैं। उनके नाना ने भी मन्त्री होने का फल दिखा दिया। ऐसा कहकर उसने उन सब अधिकारियों तथा आये हुए भी उस मिथ्याचारी लेखक को पकड़वाकर बुलाया और सब को मरवा डाला और ऐसे नीच कार्य करनेवाली पुत्रघातिनी पत्नी काव्यालंकारा को भी गड्ढे में डलवा दिया ॥१ ८-११३॥ अत्यन्त द्वेष के कारण अन्धी बुद्धि से बिना विचारे जो पाप किया जाता है उससे विपत्ति क्यों न आयगी ? ॥११४॥ राजा ने राजकुमारों के साथ गये हुए सभी अधिकारियों और नौकरों को हटाकर उनके स्थान पर दूसरे व्यक्तियों की नियुक्ति की ॥११५॥