कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १९७ 'हे भद्र ! तुम्हें यहीं रहना चाहिए और भोजन के समय राजभवन के मध्यम (बिचले) खंड में जाना चाहिए' ॥५१॥ ऐसा कहकर उनके अन्तर्धान होने पर मैंने सोचा कि निश्चय ही यह दिव्य स्थान कार्तिकेय स्वामी का बनाया हुआ है ॥५२॥ मेरे पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से उन्होंने स्वप्न में मुझ पर कृपा की है। अतः यहाँ रहने से अवश्य ही मेरा कल्याण है ॥५३॥ ऐसा विश्वास रखकर मैं उठा और दैनिक कृत्यों से निबटकर बैठा और भोजन के समय फिर गया ॥५४॥ इसी प्रकार, मैं बिचले खंड में चढ़ा। वहाँ जाते ही सोने के बरतनों में आकाश से दूध-भात आदि दिव्य जो-जो भी भोजन सोचता था वह-वह भोजन मुझे प्राप्त हो जाता था। महाराज ! मैं उस भोजन को खाकर अत्यन्त सुखी हो गया ॥५५-५६॥ हे प्रभु ! तभी से मैं इस भवन में इच्छा करते ही प्राप्त होनेवाले स्त्री परिवार चाकर और राजकीय भोगों से सुखी रहकर निवास करने लगा ॥५७-५८॥ हे महाराज ! इस प्रकार मैं बढ़ई होकर भी दैववश राज्यधर नाम धारण करके राजाओं की-सी लीला कर रहा हूँ ॥५९॥ इसलिए हे महाराज ! आज दिन आप लोग मेरे निमित्त इस नगर में विश्राम करें मैं यथाशक्ति आपकी सेवा में तत्पर हूँ ॥६०॥ ऐसा कहकर वह राज्यधर नामक मन्त्री के साथ नरवाहनदत्त को उस नगर के उद्यान में ले गया ॥६१॥ वहाँ पर बावली के जल से स्नान करके और शिव की पूजा करके उस नरवाहनदत्त को उस भवन के बिचले खण्ड में पहुँचा दिया गया और वहाँ बैठकर नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख के साथ ध्यान करते ही तुरन्त उपस्थित होनेवाले आहार से तृप्ति प्राप्त की। राज्यधर भी साथ ही उपस्थित था ॥६२॥ तदनन्तर दिव्य सन्तान व्यक्ति द्वारा उस स्थान के स्वच्छ किये जाने पर नरवाहनदत्त मद्य पान करके और पान चबाकर आराम करने लगा ॥६३॥ तदनन्तर राज्यधर के भोजन कर लेने पर उस विन्ध्याटवीनगर की कन्या के बारे में नरवाहनदत्त ने चिन्ता की ॥६४॥ कलिङ्गसेना की पुत्री की उत्सुकता के कारण निद्रा न आने से हर्षित नरवाहनदत्त को देखकर राज्यधर ने कथा आरम्भ किया—॥६५॥