भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक १९९ 'राजन् ! सोते क्यों नहीं ? आप अपनी ईप्सित प्रियतमा कर्पूरिका को अवश्य प्राप्त करायें। क्योंकि लक्ष्मी के समान स्त्री भी उदार हृदयवाले का वरण करती है॥६६ ९७॥ यह बात हमने स्वयं ही प्रत्यक्ष रूप से देखी है। जिसे मैं कहता हूँ सुनो— मानपरा और अर्थसोम की कथा कांची नगरी के बाहुबल नामक राजा जिसके विषय में मैंने तुमसे कहा है का अर्थसोम नाम का एक धनी दरबारी था। उसकी मानपरा नामकी सुन्दरी रूपवती स्त्री थी ॥६८ ६९॥ वह लोभी बनिया मुनीम या अन्य नौकरों को बीच में न रखकर व्यापार-वाणिज्य के कार्यों में अपनी स्त्री को ही रखता था ॥७०॥ उसकी पत्नी इस कार्य को न चाहती हुई भी उसकी इच्छा से विवश होकर अपने मधुर रूप, भाषण और व्यवहार से मनुष्यों को आकृष्ट कर उसका व्यापार चलाती थी ॥७१॥ वह सुन्दरी हाथी घोड़े रत्न आदि के विक्रय से प्रचुर धन कमाती थी और उसका पति उसकी प्रशंसा करता था ॥७२॥ एक बार, किसी दूर देश से मुगुधन नाम का एक बड़ा धनी व्यापारी घोड़े आदि माल लेकर कांची में बेचने के लिए आया ॥७३॥ उसे आया हुआ देखकर उस लोभी अर्थसोम ने कमाई के लोभ से अपनी पत्नी से कहा—मुगुधन नाम का बनिया दूर देश से यहाँ आया है ॥७४॥ हे प्यारी ! वह बीस हजार चीनी घोड़े और तरह-तरह के अनगिनत कीमती वस्त्र लाया है ॥७५॥ इसलिए, तू उसके पास जाकर पाँच हजार घोड़े और दस हजार कपड़ा ले लोई खरीद ले ॥७६॥ तब मैं उन हजारो घोड़ों और कपड़ों को लेकर राजा का दर्शन करके उससे व्यापार करूँ ॥७७॥ ऐसा कहकर उस पापी अर्थसोम के द्वारा भेजी गई मानपरा मुगुधन के पास पहुँची और उसने बीस हजार घोड़ों और कपड़ा की माँग की ॥७८॥ उस सुन्दरी देखकर कामातुर बनिया मुगुधन एकान्त म ले जाकर बोला—'दाम देकर तो मैं तुम्हें एक भी घोड़ा या एक भी वस्त्र न दूंगा ॥७९॥