कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] अष्टम लम्बक २४१
[Body] इस अवसर पर, सारी नगरी की गलियाँ और सड़कें चन्दन के जल से सींची गई थीं और नागरिक रमणियों के सकटाक्ष नयन मार्गों उनपर फैले हुए थे ॥७४॥
राजभवन में जाकर वीरभट ने अपने समधी और जामाता का विधिवत् स्वागत-सत्कार करके शास्त्रानुसार कन्यादान की विधि सम्पन्न की। दहेज में विशुद्ध स्वर्ण के दस भार१ रत्न और आभूषणों से लदे हुए एक सौ ऊँट और विविध प्रकार के वस्त्रादि से लदे हुए पाँच सौ ऊँट, साठ हजार घोड़े, पाँच हजार हाथी तथा सुन्दर आभूषणों से सजी हुई एक हजार रूपवती स्त्रियाँ (दासियाँ) उन दोनों कन्याओं के विवाहोत्सव पर दीं ॥७५-७८॥
इसके अतिरिक्त समधी और जामाता का अच्छे-अच्छे रत्नों और वस्त्राभरणों से तथा भूमिदान से विशेष सत्कार किया ॥७९॥
उसी प्रकार अति प्रसन्न नागरिक जनों के साथ राजा के प्रहस्त आदि मन्त्रियों का भी विधिपूर्वक सत्कार किया ॥८०॥
इस अवसर पर माता-पिता के साथ सूर्यप्रभ भी विविध प्रकार के भोजन पान गान वाद्य आदि का आनन्द लेने लगा ॥८१॥
इसी बीच रम्भ के राजा वज्रप्रभ की ओर से दूत आया और दरबार में बैठे हुए सूर्यप्रभ से अपने स्वामी का सन्देश कहा- 'हे महाराज ! विद्याओं के बल से मदोन्मत्त सूर्यप्रभ ने मेरा कन्या हरण-रूपी (अपमान) किया है ॥८२-८३॥
ज्ञात हुआ है कि मेरे ही समान विपत्ति (कन्या-हरण) वाले राजा वीरभट से आज आपने मित्रता स्वीकार की है। इसी प्रकार, आप मेरे साथ सन्धि करें और यहाँ पधारें, अन्यथा अपने प्राण त्याग द्वारा ही मैं अपने अपमान का प्रायश्चित्त करूँगा' ॥८४-८५॥
यह सन्देश सुनकर तथा दूत का सत्कार करके राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त से कहा- 'तुम जाओ और हमारी ओर से राजा रम्भ को कहो कि वह व्यर्थ सन्ताप न करें। सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है। तुम्हारी तथा अन्य राजाओं की कन्याएँ इसी की पत्नियाँ हैं, इस प्रकार शिवजी ने आदेश दिया है ॥८६-८७॥
[Footer] १. भार, प्राचीन समय का एक परिमाण जो दो मन से कुछ अधिक था।—अनु. ३१