कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक २४५
दूसरे दिन वह राजा चन्द्रप्रभ सूर्यप्रभ रम्भ वीरभट आदि अपने अनुचरों के साथ विमान द्वारा राजा कुम्भीर की सुन्दर बुर्जों से युक्त तथा अनेक रत्नों से भरी हुई कांची नगरी पहुँच गया ॥१०४-१०५॥ वहाँ पर राजा कुम्भीर ने सूर्यप्रभ को अपनी कन्या तथा उसके साथ बहुत-सा धन दिया ॥१०६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने पर भोजन आदि से निवृत्त होकर, विश्राम करते हुए चन्द्रप्रभ को प्रहस्त ने सभी के सामने कहा—'महाराज मैं भ्रमण करता हुआ श्रीकंठ देश की ओर गया था वहाँ प्रसंगवश मिले हुए राजा कान्तिसेन ने कहा कि सूर्यप्रभ मेरी कन्या कान्तिमती को लेकर मेरे घर पर आवें मैं उनका विधिपूर्वक सत्कार करूँगा ॥१०७-१०९॥ अन्यथा कन्या के स्नेह से विह्वल होकर मैं शरीर-त्याग कर दूँगा। इस प्रकार, उसके कहने पर प्रस्ताव-रूप से आपसे मैंने निवेदन कर दिया ॥११०॥ प्रहस्त के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने कहा—'तो जाओ और उसकी कन्या कान्तिमती को उसके पास पहुँचाओ ॥१११॥ इसके पश्चात् हमलोग वहाँ आ रहे हैं। राजा के ऐसी आज्ञा देने पर प्रहस्त ने कान्तिमती को पिता कान्तिसेन के समीप पहुँचा दिया ॥११२॥ प्रातःकाल ही वे चन्द्रप्रभ आदि सभी राजा कुम्भीर के सहित आकाशचारी विमान द्वारा श्रीकंठ देश को गये ॥११३॥ वहाँ भी राजा कान्तिसेन ने सबकी अगवानी करके अपनी कन्या का विवाह महास- समारोह के साथ सम्पन्न किया ॥११४॥ तदनन्तर, पुत्री कान्तिमती और जामाता सूर्यप्रभ को रत्नों का अमूल्य संग्रह प्रदान किया जिसे देखकर सभी राजा आश्चर्य-चकित हो गये ॥११५॥ जब वे सब राजा कान्तिसेन के यहाँ विविध प्रकार के स्वागत-सत्कार का आनन्द ले रहे थे तभी सबके सामने कौशाम्बी नगरी से आये हुए दूत ने इस प्रकार कहा—॥११६॥ राजा जनमेजय आपसे यह कहते हैं कि 'कुछ दिन हुए मेरी कन्या वरपुष्टा का किसीने अपहरण कर लिया था ॥११७॥