कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १५ चूर्ण न मिल सकने के कारण वह ताँबा सोना न बन सका। इस प्रकार, तीन बार करने पर भी ब्रह्मचारी का प्रयत्न निष्फल ही रहा ॥८६॥ तब राजा ने दुःखित ब्रह्मचारी से उस चूर्ण को लेकर स्वयं पिघले हुए ताँबे में डाला और उससे सोना बन गया ॥८७॥ राजा के चूर्ण डालने पर यक्ष ने उसका अपहरण नहीं किया और मुस्कराकर चला गया ॥८८॥ इस घटना से आश्चर्य चकित उस ब्रह्मचारी के पूछने पर राजा ने यक्ष की बात उसे कह सुनाई ॥८९॥ तब राजा ने उस ब्रह्मचारी से चूर्ण बनाने की युक्ति सीख ली और उसका विवाह कराकर पालन-पोषण की व्यवस्था कर दी ॥९०॥ और, उस युक्ति से सोना बनाकर राजा ने अपने भण्डार को समृद्ध कर लिया ॥९१॥ इस प्रकार, डरा हुआ या प्रसन्न ईश्वर उच्च सत्त्ववालों को सिद्धि प्रदान करता ही है ॥९२॥ इसलिए 'हे महाराज ! तुमसे गम्भीर सत्त्वशाली और कौन दाता है। अतः शिव तुम्हें पुत्र प्रदान करेंगे। शोक मत करो' ॥९३॥ इस प्रकार, रानी अलंकारप्रभा के उदार वचन सुनकर राजा हेमप्रभ प्रसन्न हुआ और उसकी बातों पर उसने विश्वास किया ॥९४॥ राजा ने अपने उत्साह-भरे हृदय से शिव की आराधना से पुत्र की प्राप्ति को सम्भव समझा ॥९५॥ तब दूसरे दिन राजा हेमप्रभ रानी के साथ स्नान करने के बाद शिव की पूजा करके और ब्राह्मणों को नौ करोड़ सोने की मुद्राएँ दान करके पुत्र-प्राप्ति के लिए निराहार होकर शिव के सम्मुख तप करने के लिए बैठ गया और उसने यह निश्चय कर लिया कि या तो देह-त्याग करूँगा अथवा शंकर को प्रसन्न करूँगा ॥९६-९७॥ तप में बैठे हुए उसने भगवान् गिरिजापति की इस प्रकार स्तुति की—'शरण में आये हुए उपमन्यु को स्वेच्छा से दुग्ध-समुद्र दान करनेवाले संसार की उत्पत्ति रक्षा और प्रलय करने वाले हे शंकर ! तुम्हें प्रणाम है। हे आकाश आदि अष्टमूर्ति धारण करनेवाले गौरीपति ! तुम्हें प्रणाम है ॥९८-९९॥ हे निरन्तर खिले हुए हृदय-कमल में निवास करनेवाले निर्मल मानस-सरोवर के कलहंस शम्भू ! तुम्हें प्रणाम है ॥१००॥