भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक २७१ इस प्रकार की शंका करता हुआ राजा जब विलम्ब कर रहा था तब दो ब्राह्मण परस्पर झगड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥१४॥ वे दोनों वहाँ राजा को उपस्थित देखकर न्याय कराने के लिए उनमें से एक बोला- राजन्, इसने दक्षिणा के साथ मुझे गौ दी है ॥१५॥ उसे लौटाते हुए मुझसे यह अपने हाथ से क्यों नहीं लेता ? तब दूसरा ब्राह्मण बोला-'मैंने पहले कभी दान नहीं लिया है और न मुझे यह आवश्यक है। अतः, मैं क्यों लूँ? यह सुनकर राजा ने कहा कि 'वापी शुद्ध नहीं है। वह स्वयं दान लेकर फिर दाता को हठपूर्वक गौ क्यों देता है ? राजा के ऐसा कहने पर बीच में ही इन्द्र ने कहा- हे राजन् जब इस प्रकार का न्याय तुम जानते हो तब इस जापक ब्राह्मण से वर की याचना करके मिलते हुए उसे क्यों नहीं लेते ॥१ ५८॥ तब राजा ने निरुत्तर होकर ब्राह्मण से कहा-'भगवन् अपने किये जप का आधा फल मुझे दे दो' ॥१ ९॥ 'ठीक है, मेरे जप का आधा फल तुम्हें मिले'-जापक ब्राह्मण ने राजा को इस प्रकार वर दे दिया ॥१११॥ इस फल के प्रभाव से उस राजा ने समस्त लोकों में गति (जाने की शक्ति) प्राप्त की और उस ब्राह्मण ने शिव नाम के देवलोक को प्राप्त किया ॥१२१॥ इस प्रकार, असंख कल्पों तक भिन्न-भिन्न लोकों में रहकर और पुनः पृथ्वी पर आकर स्वतन्त्रतापूर्वक योगाभ्यास से अक्षय सिद्धि प्राप्त की ॥१२२॥ इस प्रकार, विज्ञजन स्वर्ग आदि भोगों से विमुख रहकर केवल सिद्धि प्राप्ति का ही लक्ष्य रखते हैं। वह सिद्धि तुमने प्राप्त कर ली है, अब तुम स्वतन्त्र हो। अब अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करो ॥१२३॥ योगदान करनेवाले मय द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रप्रभ अपनी रानियों पुत्र और मन्त्रियों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१२४॥ तब मय दानव राजा चन्द्रप्रभ को सब परिवार के साथ दूसरे पाताल में ले गया और पुत्र पत्नी आदि के साथ उसे एक दिव्य गृह में प्रवेश कराया ॥१२५॥ उस गृह के भीतर उन सबने उत्तम शय्या पर सोये हुए के समान एक दिव्य पुरुष को देखा ॥१२६॥ वह बड़ी-बड़ी आपत्तियों और धूल में लिपटा हुआ-सा था और आकृति से विकृत हो जाने से डरावना-सा प्रतीत होता था। मुंह लटकाए दैववश सो कर/ता ग वह घिरा हुआ था ॥१२७॥ ३५