भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक २१५ तब इन्द्र की माता अदिति ने कहा—'हे इन्द्र घमंडता छोड़ो मय को प्रसन्न करो। नम्रता के फल को तुमने देखा कि आज मय ने कितने ही अच्छे वर प्राप्त किये' ॥४११॥ यह सुनकर इन्द्र ने मय को हाथों से पकड़कर प्रसन्न किया। उस समय युद्धधर्मा सूर्यप्रभ के आगे दिन में निकले हुए चन्द्रमा के समान निष्प्रभ लग रहा था ॥ ४१२॥ तदनन्तर, लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र ने ऋषि को प्रणाम करके अपने लोक को प्रस्थान किया और मय आदि भी मुनि की आज्ञा से प्रस्तुत कार्य को सफल बनाने के लिए उसके आश्रम से अपने निवासस्थान को चले गये ॥४१३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ नामक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग सूर्यप्रभ का उद्योग तदनन्तर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ ये सभी उस कश्यप-आश्रम से चलकर चन्द्रभागा और इरावती के संगम पर पहुँचे जहाँ सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में उसके मित्र बन्धु, ससुर आदि सभी ठहरे हुए थे ॥१ २॥ सूर्यप्रभ को देखकर वहाँ ठहरे हुए सभी राजा और मित्र बन्धु मरने को तैयार होकर रोते हुए उसके सामने आये ॥३॥ चन्द्रप्रभ को न देखने से उसके प्रति बुरी आशंका से दुःखित उन सब को सूर्यप्रभ ने जो कुछ समाचार था सब कह सुनाया ॥४॥ इस पर भी अत्यन्त व्याकुल हुए सूर्यप्रभ के उनसे पूछने पर उन्होंने श्रुतशर्मा द्वारा उनकी समस्त मर्यादा का अपहरण-वृत्तान्त अत्यन्त कठिनाई से कह सुनाया ॥५॥ श्रुतशर्मा द्वारा किये गये अपमान से दुःखी होकर अपने मरने का निश्चय और आकाशवाणी द्वारा उसका रोका जाना सब उन्होंने कह सुनाया ॥६॥ यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने क्रोध में यह प्रतिज्ञा की कि यदि ब्रह्मा आदि सभी देवता भी श्रुतशर्मा की रक्षा कर तो भी उन का समूल नाश करूँगा ॥७८॥