कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठम लम्बक १६१ वे चक्रवाल और निर्घात परस्पर घमासान युद्ध करते हुए रथ घोड़े सारथी आदि के मारे जाने पर पैदल ही युद्ध करने लगे ॥७६॥ ढाल और तलवार से युद्ध करते हुए और क्रोध से भिड़े हुए, परस्पर के ही खड्ग प्रहार से कटे हुए सिरोंवाले दोनों ही भूमि पर गिर पड़े ॥७७॥ उन दोनों वीरों को गिरे हुए देखकर दोनों ओर की सेनाएँ निराश हो गई तब विद्याधरों का राजा कालकम्पन रणभूमि में सामने आया ॥७८॥ उधर से प्रकंपन नाम का राजकुमार उसके सामने आया। उसे कालकम्पन ने क्षण-भर में ही गिरा दिया ॥७९॥ उसके गिरते ही दूसरे पाँच महारथी मैदान में आये। वे ये—वालिक दंडदत्त नौपक, सोमिल और पितृशर्मा। सभी ने एक साथ कालकम्पन पर बाणों की बौछार की किन्तु उस काल- कम्पन ने पाँचों को रथहीन कर दिया ॥८०-८१॥ और, एक साथ ही पाँच बाणों से पाँचों के कलेजे बींध दिये। इससे खेचर (विद्याधर) तो प्रसन्न हुए और मनुष्य और असुर दुःखी हुए ॥८२॥ तब चार रथ एक साथ उसकी ओर दौड़ पड़े। वे चारों रथों में थे—उग्रतक्क प्रधस्त विप्रंचक और धुरंधर। कालकम्पन ने उन चारों को भी सहज में ही मार गिराया। और, उसी प्रकार दौड़कर आये हुए दूसरे छह महारथियों को भी मार डाला ॥८३-८४॥ तदनन्तर, कालकम्पन ने युद्ध में सामने आये हुए और पाँच महारथियों को भी मार दिया। वे पाँच महारथी थे—तेजिक मेधिक वेगिल शालित भयंकर और पंडी। इनके साथ बड़ी-बड़ी सेनाएँ भी मारी गई ॥८५॥ इसके अतिरिक्त युद्ध में आये हुए भीम भीषण कुम्भीर, विकट और विलोचन नामक पाँच महारथियों को भी धराशायी कर दिया ॥८६॥ इस प्रकार, कालकम्पन द्वारा किये जानेवाले संहार को देखकर सुपद्म नामक राजपुत्र युद्ध में उसके सामने आया ॥८७॥ वे दोनों परस्पर युद्ध करते हुए सारथी और रथ से विहीन हो गये ॥८८॥ तब पैदल युद्ध करते हुए कालकम्पन ने सुपद्म को तलवार से काटकर भूमि पर गिरा दिया ॥८९॥ इतने में ही मनुष्यों के साथ विद्याधरों के युद्ध को अयुक्त समझकर, अतएव मानों खिन्न होकर सूर्य भगवान् अस्ताचल को चले गये ॥९०॥ ४१