भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक १८५ सिद्धों का यह आदेश है कि वह कन्या भावी विद्याधर-चक्रवर्ती की पत्नी बनेगी इसलिए हे स्वामिन् आप उसे छुड़ायें ॥१२६॥ दुःखित बेताल के इस प्रकार दीन बचन सुनकर महाकाल स्वामी ने हम योगिनियों को आदेश दिया कि जाकर उसे छुड़ाओ। हम लोगों न आकाश से उड़कर उस कन्या को प्राप्त किया ॥१२७॥ उसे हरण करनेवालेतेज प्रभ ने कहा-'विद्याधर चक्रवर्ती श्रुतशर्मा के लिए मैं इसे ले जा रहा हूँ। हम लोगों ने आत्मशक्ति से उसका स्तम्भन करके उस कन्या को लाकर प्रभु (महाकाल) को अर्पित किया ॥१२८॥ किन्तु प्रभु न वह कन्या उसके बन्धुओं को दे दी यह मैंने बड़ा अपूर्व दृश्य देखा। तदनन्तर, कुछ दिन वहीं रहकर और भगवान् को प्रणाम कर यहाँ आई हूँ ॥१२९॥ इस प्रकार कहती हुई योगिनी से हम लोगों ने यह पूछा कि तुम सब कुछ जानती हो तो बताओ कि भविष्य में विद्याधर-चक्रवर्ती कौन होगा ? ॥१३० ॥ 'सूर्यप्रभ होगा' इस प्रकार योगिनी के उत्तर देने पर सिंहबल हम लोगों से कहने लगा-'यह मिथ्या है क्योंकि श्रुतशर्मा के पक्ष में इन्द्र आदि देवता कमर कसकर तैयार हैं। यह सुनकर भार्या योगिनी बोली-'तुम लोगों को विश्वास न हो तो सुनो मैं कहती हूँ-शीघ्र ही श्रुतशर्मा और सूर्यप्रभ का युद्ध होगा। उस समय यदि सिंहबल तुम लोगों के सामने मनुष्य से मारा जायगा तो तुम दोनों मेरे इस सूचना-चिह्न को देखकर मेरी बात को सत्य मानोगे' ॥१३१-१३३॥ ऐसा कहकर वह योगिनी चली गई और वे दिन भी बीत गये। आज हम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि मनुष्य ने सिंहबल को मार दिया ॥१३४॥ इस विश्वास के कारण आपको ही आकाशचारियों (विद्याधरों) का चक्रवर्ती मानकर हम दोनों आपके चरणों में उपस्थित हुए हैं। और हम लोग अब आपके आज्ञाकारी हैं' ॥१३५॥ ऐसा कहते हुए विद्याधरों के राजा महायान और सुमाय का सूर्यप्रभ ने मय आदि की सम्मति लेकर समुचित सम्मान दिया ॥१३६॥ यह समाचार सुनकर अत्यन्त व्याकुल श्रुतशर्मा को आश्वासन देने के लिए इन्द्र ने विश्वा- वसु (गन्धर्व) को दूत के रूप में उसके पास भेजा और उसके द्वारा स्नेहपूर्वक उसने यह सन्देश भेजा-'तुम धैर्य रखो मैं प्रातःकाल सब देवताओं के साथ समर-भूमि में तुम्हारी सहायता करूँगा' ॥१३७॥ शत्रुपक्ष में आपसी फूट देखकर सन्तुष्ट और रणभूमि में शत्रुदल को पराजित किया हुआ सूर्यप्रभ उस रात को भी अपनी पत्नियों को छोड़ कर मन्त्रियों के साथ अपने शयन-गृह में चला गया ॥१३८॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त ४९