भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ४१५ क्योंकि, पुत्र आत्मा ही होता है। मेरा वचन व्यर्थ न जाय। इतना कहकर इन्द्र शान्त होगया ॥१९४॥ तब पिता ने मुझे उज्जयिनी में लाकर मामा के घर रख दिया जिसका जैसा भवितव्य है वैसा होता ही है॥१९५॥ उज्जयिनी में रहते हुए दैवयोग से वहाँ के राजा के साथ मेरी मित्रता हो गई। गुणशर्मा ने इस प्रकार अपना मूल समाचार कहकर रानी अशोकावती और राजा द्वारा किये गये युद्ध पर्यन्त की कथा उस ब्राह्मण से कह दी ॥१९६-१९७॥ और फिर बोला—'हे ब्राह्मण देवता इस प्रकार मैंने उज्जयिनी से भागते हुए मार्ग में आपके दर्शन किये' ॥१९८॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण गुणशर्मा से बोला—'हे प्रभो यदि ऐसा है, तो तुम्हारे आगमन से मैं धन्य हो गया ! ॥१९९॥ आप मेरे घर पधारें। मेरा नाम अग्निदत्त है। यह गाँव भी मेरे ही नाम से है। अब आप निश्चिन्त हो जायें' ॥२००॥ इतना कहकर अग्निदत्त धन-धान्य गौ-भैंस और घोड़ों आदि से भरे हुए अपने घर में गुणशर्मा को ले गया ॥२०१॥ वहाँ ले जाकर उसने उबटन मालिश स्नान तथा सुन्दर वस्त्राभरणों एवं इत्र से गुणशर्मा का स्नेह-पूर्ण सम्मान किया और विविध प्रकार के भोजन कराये ॥२०२॥ तदनन्तर, लगन दिखाने के बहाने उसने देवताओं से भी चाही जानेवाली अपनी सुन्दरी कन्या उसको दिखा दी ॥२०३॥ अनुपम सुन्दरी उस कन्या के लक्षणों को देखकर गुणशर्मा ने कहा—'इसकी बहुत-सी सपत्नियां (सौतें) होंगी ॥२०४॥ इसकी नाक पर तिल है, इस कारण मैं ऐसा कह रहा हूँ और इसकी छाती में भी तिल है। यह फल उसी का है' ॥२०५॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर उसके भाई ने पिता की आज्ञा से उसकी छाती खोलकर देखी, तो वहाँ तिल दिखाई दिया ॥२०६॥ तब पण्डित अग्निदत्त ने गुणशर्मा से कहा—'तुम सचमुच सर्वज्ञ हो किन्तु इसके ये दोनो तिल अशुभ फल देनेवाले नहीं हैं ॥२०७॥ पति के धनवान् होने पर ही सौतें होती हैं। दरिद्र तो एक स्त्री का भरण-पोषण भी कष्ट से करता है। बहुत-सी स्त्रियों की तो बात ही क्या' ॥२०८॥