भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ४५९ इसी विद्या के द्वारा यह भी जाना कि तुम भी यहाँ आये हो। अतः देवता के आदेश से प्राप्त इस कन्या को ग्रहण करो ॥५२॥ इसके पिता का बताया हुआ विवाह-लग्न कल प्रातःकाल है। अतः आज तुम अपनी कौशाम्बी नगरी को जाओ और हम दोनों भी यहाँ से जाती हैं। प्रातःकाल इसके पिता धर्मकार धौत तपोवन से आकर, इस कन्या को स्वयं तुम्हें देंगे ॥५३-५४॥ कांचनप्रभा के इस प्रकार कहने पर, उस अलंकारवती और नरवाहनदत्त-दोनों की अवस्था अवर्णनीय हो गई ॥५५॥ वे दोनों चकवा-चकवी के समान परस्पर एक रात्रि का वियोग-दुःख भी सहन करने में असमर्थ हो रहे थे। अतः सायंकाल के समय उन दोनों की आँखों में आँसू थे ॥५६॥ उन दोनों को इस प्रकार आतुर देखकर कांचनप्रभा ने कहा—'एक रात्रि के ही वियोग में तुम दोनों को इतना अधैर्य क्यों हो रहा है ? ॥५७॥ धैर्यशाली व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक चिरकालीन विरह का सहन करते हैं। इस सम्बन्ध में रामचन्द्र और सीतादेवी की कथा सुनो ॥५८॥ राम और सीता की कथा प्राचीन समय में अयोध्या-नरेश दशरथ के पुत्र राम भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न— इन चारों भाइयो में राम सबसे बड़ा था। वह रावण का विनाश करने के लिए विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ था। जनक राजा की सीता नाम की पुत्री उसकी प्राणप्यारी पत्नी थी ॥५९-६०॥ दैवयोग से भरत को राज्य देकर पिता ने राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन भेज दिया ॥६१॥ वहाँ वन में रावण ने कपट करके उसकी प्राणप्यारी सीता का हरण कर लिया और मार्ग में जटायु का वध करके वह उसे लंका को ले गया ॥६२॥ तब वियोगी राम ने बाली को मारकर और सुग्रीव से मित्रता की और हनुमान् को लंका भेजकर उसका समाचार प्राप्त किया ॥६३॥ तदनन्तर, राम ने समुद्र-तट पर जाकर उसमें पुल बाँधकर रावण को मारा और लंका का राज्य विभीषण को देकर सीता को प्राप्त किया ॥६४॥

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