भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक ३१ राजा की अस्सी हजार रानियां इस घटना से जन-समाज के सामने अत्यन्त लज्जित हुई ॥३४॥ तब राजा ने भी लज्जित होकर अपने नगर की सभी स्त्रियों को बुलाकर क्रम से हाथी को छुआया ॥३५॥ फिर भी वह हाथी न उठा तो राजा को इसके लिए बड़ी लज्जा इस बात की हुई कि मेरे नगर में एक भी सदाचारिणी स्त्री नहीं है ॥३६॥ इतने में ताम्रलिप्ती (तमलुक) नगरी से आया हुआ हर्षगुप्त नाम का एक वैश्य उस तमाशे को देखने के लिए आया। उसके पीछे उसकी एक शीलवती नाम की सधवा पत्नी भी आई और उसने देखकर कहा ॥३७-३८॥ मैं इस हाथी को हाथ से छूती हूँ। यदि मैंने अपने पति के सिवाय दूसरे को मन से भी न ध्यान किया हो तो यह हाथी उठ जाय ॥३९॥ ऐसा कहकर और समीप जाकर उसने हाथी को छू दिया। उसके छूते ही हाथी उठ खड़ा हुआ और आहार करने लगा ॥४०॥ इस प्रकार, ईश्वर के समान इस संसार की सृष्टि पालन और संहार करने में समर्थ पतिव्रता स्त्रियां विरले ही हैं। इस प्रकार, कोलाहल करती हुई जनता वहाँ पर सती शीलवती की प्रशंसा करने लगी ॥४१ ४२॥ राजा ने प्रसन्न होकर सती शीलवती को असंख्य धन रत्न दिये और उसके पति हर्षगुप्त को राजभवन के समीप ही घर देकर बसा दिया और उसका बहुत सत्कार किया ॥४३ ४४॥ और तभी से उस राजा ने अपनी सभी स्त्रियों का स्पर्श तक छोड़ दिया और उनके लिए केवल भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध कर दिया ॥४५॥ तदनन्तर राजा ने हर्षगुप्त को बुलवाया। उसके साथ भोजन करने के बाद राजा ने सती शीलवती से एकान्त में कहा— ॥४६॥ 'हे शीलवती ! क्या तुम्हारे पिता के कुल में कोई कन्या है ? यदि है तो उसे मुझे दिलवाओ। मैं समझता हूँ कि वह भी तुम्हारे समान अवश्य सदाचारिणी होगी ॥४७॥ उस राजा से इस प्रकार कही गई शीलवती बोली— ताम्रलिप्ती नगरी के शंखदत्ता नाम की मेरी बहन है। महाराज यदि आप चाहते हैं तो उस सुन्दरी से विवाह कीजिए ॥४८ ४९॥