कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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तब रोते हुए राम ने सब को वहीं बैठाकर उन दोनों को गले लगाया और कहा कि वह पापी राम मैं ही हूँ। (तुम दोनों जिसके पुत्र हो) ॥११० ॥ तदनन्तर एकत्र नगर-निवासियों के सीता की प्रशंसा करने पर राम ने उन दोनों पुत्रों को स्वीकार किया ॥१११॥ तब सीतादेवी को बाल्मीकि के आश्रम से बुलाकर और पुत्रों को राज्य का भार सौंप कर राम सुखपूर्वक रहने लगे ॥११२॥ इस प्रकार, धैर्यशाली महापुरुष इतने भीषण विरहों का भी सहन करते हैं। पुत्रो तुम दोनों एक रात्रि का विरह भी सहन नहीं कर पा रहे हो ॥ ११३॥ इस प्रकार, विवाह के लिए उत्सुक पुत्री अलङ्कारवती और नरवाहनदत्त से कांचन- प्रभा ने कहा ॥११४॥ ऐसा कहकर और कन्या को साथ लेकर कांचनप्रभा प्रातःकाल आने के लिए आकाश मार्ग से उड़कर चली गई और दुखी चित्त नरवाहनदत्त भी कौशाम्बी लौट आया ॥११५॥ कौशाम्बी में रात्रि को निद्राहीन नरवाहनदत्त का मनोरंजन करते हुए गोमुख ने कहा- 'महाराज मैं तुम्हें पृथ्वीरूप राजा की कथा सुनाता हूँ सुनो'—॥११६॥
राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा
दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठान नाम का एक नगर है। वहाँ पृथ्वीरूप नाम का अत्यन्त रूपवान् राजा था ॥११७॥ किसी समय उसके समीप दो ज्ञानी श्रमण (बौद्ध भिक्षु) आये और राजा के आश्चर्यकारी सुन्दर रूप को देखकर बोले-॥११८॥ 'राजन्, हम दोनो सारे भू-मण्डल में घूमे किन्तु हे प्रभु, तुम्हारे जैसा रूपवान् पुरुष या स्त्री कहीं भी हमने नहीं देखा ॥११९॥ किन्तु, मुक्तिपुर द्वीप में राजा रूपधर की पत्नी हेमलता देवी से उत्पन्न रूपलता नाम की कन्या है ॥१२० ॥ वही एक तुम्हारे योग्य है और तुम्हीं एक उसके योग्य हो। यदि तुम दोनों का विवाह हो जाय तो बहुत अच्छा हो ॥१२१॥ इस प्रकार श्रमणों की बातों को सुनकर कामदेव के बाण राजा के कानों द्वारा घुसकर उसके हृदय में जा लगे ॥१२२॥ तब उत्कण्ठित राजा पृथ्वीरूप ने कुमारदत्त नामक अपने कुशल चित्रकार को आज्ञा दी ॥१२३॥