कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ४०१
उस राजा को अपने समान सुन्दरी कन्या नहीं मिली इसीलिए उसने अभी तक विवाह ही नहीं किया ॥१३९॥ महाराज मैंने तो नयनों के प्यारे उस राजा को देखकर ही उसके सौन्दर्य के कौतूहल से पत्र पर उसका चित्र भी बना दिया है, ॥१४०॥ उसके इस प्रकार कहने पर राजा ने पूछा कि 'क्या उसका चित्रपट तुम्हारे पास है ?' उत्तर में चित्रकार ने 'हैं'—ऐसा कहकर राजा को वह चित्र दिखा दिया ॥१४१॥ उस चित्रपट पर राजा पृथ्वीरूप का रूप देखकर राजा रूपधर ने आश्चर्य के साथ अपना सिर हिलाया ॥१४२॥ और प्रसन्न होकर वह बोला—'हम धन्य हैं। जिन्होंने वस्त्र पर लिखे राजा के इस रूप को देखा और जो लोग इसे प्रत्यक्ष देखते हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं ॥१४३॥ पिता के ऐसे वचन सुनकर और चित्र में राजा को देखकर उत्कण्ठित रूपलता ने और कुछ देखा न सुना ॥१४४॥ तदनन्तर, अपनी कन्या को काम-मोहित देखकर राजा रूपधर ने उस चित्रकार से कहा—॥१४५॥ यदि तुम्हारे चित्रपट में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है तो राजा पृथ्वीरूप इस कन्या के अनुकूल पति है। इसलिए मेरी इस कन्या के चित्रपट को ले जाकर उन्हें दिखा दो ॥१४६-१४७॥ और, यह सब समाचार सुनकर यदि उचित समझें तो मेरी कन्या का वरण करने के लिए शीघ्र ही यहाँ आवें ॥१४८॥ इतना कहकर और चित्रकार का धन से सत्कार करके राजा रूपधर ने विदूषक के साथ उसे विदा किया और अपने एक दूत को भी उनके साथ भेजा ॥१४९॥ कुछ ही दिनों में वे चित्रकार, विदूषक और दूत समुद्र को पारकर प्रतिष्ठान नगर में राजा पृथ्वीरूप के पास पहुँचे ॥१५०॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजा पृथ्वीरूप को राजा रूपधर के भेजे हुए उपहार आदि देकर मुक्त्तिपुर का सब समाचार और राजा रूपधर का सन्देश सुनाया ॥१५१॥ और, उस चित्रकार कुमारदत्त ने चित्रपट पर लिखा रूपलता का चित्र भी राजा पृथ्वीरूप को, दिखा दिया ॥१५२॥ लावण्य की विलासस्थली उस रूपलता के शरीर का चित्र में देखता हुआ राजा इस प्रकार मग्न हो गया कि वह वहाँ से अपनी दृष्टि हटा नहीं सका ॥१५३॥