भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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इन कार्यों से निवृत्त होकर राजा पृथ्वीरूप अपनी पत्नी रूपलता के साथ सांसारिक सुख-भोग करने लगा ॥१९९॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा सुनाकर अपनी ओर देखते हुए नरवाहनदत्त की ओर देख कर फिर उससे बोला—॥२ ०॥ महाराज धीर लोग इस प्रकार कष्ट के साथ विरह को चिरकाल तक सहन करते हैं और तुम एक रात्रि का भी वियोग सहन नहीं कर सकते ॥२ १॥ प्रात:काल ही तुम अलंकारवती को विवाहित करोगे। गोमुख के इस प्रकार कहने पर उसी समय आया हुआ यौगन्धरायण का पुत्र मरुभूति बोला-‘गोमुख ! काम-पीड़ा से अनभिज्ञ एवं भ्रान्तचित्त तुम यह क्या कह रहे हो ॥२ २–३ ॥ मानव धीरज विवेक चरित्र आदि को तभी तक धारण करता है, जब-तक वह कामदेव के बाणों का लक्ष्य नहीं बन जाता ॥२ ४॥ सरस्वती स्कन्ध और जिन ये तीन ही संसार में धन्य हैं जिन्होंने काम को वस्त्र के कोने में चिपके हुए कीट के समान फटकार दिया ॥२ ५॥ मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और गोमुख को घबराया हुआ देखकर नरवाहनदत्त ने उसका पक्ष लेते हुए कहा-मेरे मन का विनोद करने के लिए गोमुख ने ठीक ही कहा क्योंकि स्नेही व्यक्ति विरह के दुःख में क्या धन्यवाद देता है ? ॥२ ६-२ ७॥ आत्मीय जनों को वियोगावस्था में अपने व्यक्ति को धीरज ही देना चाहिए। उसके आगे भगवान कामदेव ही जानें ॥२ ८॥ इस प्रकार की बातें और अपने साथियों से विविध प्रकार की चर्चाएँ करते हुए नरवाहन- दत्त ने वह रात्रि किसी प्रकार व्यतीत की ॥२ ९॥ नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् प्रात काल उठकर और प्रातःकालीन आवश्यक क्रियाओं को समाप्त करके नरवाहनदत्त ने आकाश से उतरती हुई काञ्चनप्रभा विद्याधरी को देखा ॥२१ ०॥ वह अपने पति अलङ्कारशील पुत्र धर्मशील और कन्या अलङ्कारवती के साथ थी ॥२११॥ वे सब उतरकर नरवाहनदत्त के समीप आये और उसने उनका यथोचित आदर सत्कार किया ॥२१२॥

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