कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ४९९
चौथा ब्राह्मण जीवदत्त भी मुझे पसन्द नहीं है। वह कुरूप, कर्महीन, वेदरहित और पतित है ॥११३॥ वह तो तुम्हारे लिए दंड देन योग्य है। हे पिता! तुम तो वर्णों और आश्रमों के रक्षक और धर्म के प्रतिपालक हो ॥११४॥ हे राजन्, खड्गशूर से धर्मशूर अधिक प्रशंसनीय है। हजारों खड्गशूरों का एक धर्मशूर स्वामी हो सकता है ॥११५॥ इस प्रकार कहती हुई अपनी कन्या को निवास-स्थान के लिए विदा कर, राजा स्नान आदि के लिए उठ गया ॥११६॥ दूसरे दिन वे चारों क्षत्रियी वीर, द्यूता के घर से निकल और नगर देखने की इच्छा से भ्रमण करने लगे ॥११७॥ इसी बीच पद्मकलश नाम का मदान्मत्त दुष्ट हाथी साँकल तोड़कर जनता को रौंदता हुआ गजशाला से बाहर निकल आया ॥११८॥ उस हाथी ने उन चारों वीरों को देखकर, उन पर आक्रमण कर दिया। वे भी अपने- अपने शस्त्रों को उठाकर हाथी की ओर दौड़ पड़े ॥११९॥ उन में से खड्गधर नामक क्षत्रिय वीर ने और तीनों को हटाकर अकेले ही हाथी का सामना किया ॥१२०॥ और चिंघाड़ते हुए हाथी की सूँड को उसने एक ही प्रहार से कमलनाल के समान काट दिया ॥१२१॥ और पैंतरा बदलकर उसके पैरों के नीचे से निकलकर उसकी पीठ पर दूसरा प्रहार किया ॥१२२॥ उसने तीसरे प्रहार में उसके पैर काट डाले तो चिल्लाता हुआ हाथी भूमि पर गिर पड़ा और मर गया ॥१२३॥ उसके इस पराक्रम को देखकर सभी लोग चकित रह गये और राजा महावराह भी यह सब सुनकर विस्मित हुआ ॥१२४॥ दूसरे दिन वह राजा हाथी पर बैठकर शिकार के लिए वन में गया और वे चारों वीर भी उसके पीछे गये ॥१२५॥ शिकार के समय सेना के साथ राजा के अनेक बाघों, मृगों और सूअरों के मार देने पर हाथियों के चिंघाड़ सुनकर क्रुद्ध सिंह चारों ओर से राजा की ओर दौड़ पड़े ॥१२६॥