भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५३५ पिता के इस प्रकार कहने पर भी तेजस्वी समुद्रवर्मा पिता से आज्ञा लेकर दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥३७६॥ तदनन्तर, क्रमशः दिशाओं को जीतकर और राजाओं को वश में करके बहुत-से हाथी घोड़े सेना रत्न आदि प्राप्त करके अपने नगर को लौट आया ॥३७७॥ और, उसने भिन्न-भिन्न देशों में उत्पन्न होनेवाले विविध प्रकार के रत्नों से प्रसन्न माता-पिता के चरणों में प्रणाम कर उनकी पूजा की ॥३७८॥ उनकी आज्ञा से उस महायशस्वी समुद्रवर्मा ने ब्राह्मणों को हाथी घोड़े सोना रत्न आदि दान में दिये ॥३७९॥ उसने अपने सेवकों और सम्बन्धियों पर अर्थ की ऐसी वर्षा की कि एक केवल 'दरिद्र' शब्द ही अर्थहीन रह गया ॥३८०॥ इस प्रकार, पुत्र की महिमा देखकर अनंगप्रभा से युक्त राजा सागरवर्मा ने अपने को कृतकृत्य समझा ॥३८१॥ इस प्रकार सागरवर्मा ने उन दिनों को उत्सव के साथ व्यतीत करके मंत्रियों के सामने पुत्र समुद्रवर्मा से कहा— ॥३८२॥ 'बेटा मैंने इस जन्म में जो भी करना था कर लिया। राज्य का सुख देखा किन्तु शत्रुओं द्वारा पराजय नहीं देखा ॥३८३॥ और साम्राज्य प्राप्त तुम्हें भी देखा। अब मुझे क्या चाहिए। अतः जबतक यह शरीर है तबतक किसी तीर्थ का आश्रय लेता हूँ ॥३८४॥ यह शरीर नष्ट होनेवाला है। अब घर में मेरा क्या धरा है। देखो वृद्धावस्था मेरे कानों के पास आकर यही कह रही है ॥३८५॥ ऐसा कहकर पुत्र के न चाहते हुए भी वह सहृदय राजा सागरवर्मा पत्नी अनंगप्रभा के साथ प्रयाग चला गया ॥३८६॥ समुद्रवर्मा कुछ दूर तक पिता को छोड़ने आकर और फिर राजधानी में लौटकर न्यायपूर्वक अपने राज्य का शासन करने लगा ॥३८७॥ अनंगप्रभा-सहित राजा सागरवर्मा ने भी प्रयाग में जाकर तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया ॥३८८॥ तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी ने रात्रि के अन्त में स्वप्न में आकर कहा- मैं मर्त्यजीव तेरे तप से प्रसन्न हूँ। अतः वर सुनो—॥३८९॥ यह अनंगप्रभा और तुम दोनों विद्याधर हो। अब तुम्हारा शाप क्षय होने से प्रातःकाल ही तुम दोनों विद्याधर-लोक को चले जाओगे ॥३९०॥