भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५४१ यह सुनकर गोमुख ने कहा—'स्वामिन् मरुभूति ने ठीक ही कहा है। किन्तु महाराज ! इसमें आपका कुछ भी अपराध नहीं है। जबतक धन के विरोधी उसके पाप का क्षय न होगा तबतक देनेवाला स्वामी चाहने पर भी उसकी दरिद्रता को दूर नहीं कर सकता ॥५६॥ पाप के नष्ट हो जाने पर बलपूर्वक रोकने पर भी ईश्वर, किसी-न-किसी प्रकार दे ही देता है। यह सब कर्म के अधीन है ॥५७॥ इस सम्बन्ध में राजा लक्षदत्त और कार्पटिक लब्धदत्त की कथा १ सुनो ॥५८॥ राजा लक्षदत्त और लब्धदत्त भिखारी की कथा पृथ्वी पर मत्तपुर नाम का एक नगर था। उसमें दानियों में अग्रणी लक्षदत्त नाम का राजा था ॥५९॥ वह राजा याचक को एक लाख से कम देना जानता ही न था। जिस याचक से वह बात कर लेता था उसे पाँच लाख देता था ॥६०॥ जिस पर वह प्रसन्न हो जाता था उसकी तो वह जन्म भर की दरिद्रता ही दूर कर देता था। इसीलिए, उसका नाम लक्षदत्त था ॥६१॥ उस राजा के सिंहद्वार पर एक चमड़े के टुकड़े से शरीर को ढके हुए एक भिखारी दिन-रात बैठा रहता था ॥६२॥ सिर पर जटाओं को बाँधे हुए वह भिखारी शीत में वर्षा में और कड़ी धूप में भी राजद्वार से जरा भी हिलता न था और राजा सदा उसे उसी स्थिति में देखता था ॥६३॥ इस प्रकार, बहुत समय कष्ट के साथ व्यतीत करने पर राजा ने दयालु और दानी होने पर भी कुछ नहीं दिया ॥६४॥ एक बार, वह राजा शिकार खेलने के लिए घने जंगल में गया। उसके पीछे लट्ठ लेकर वह भिखारी भी गया ॥६५॥ जब कि सेना के साथ वाहन पर बैठा हुआ राजा धनुष धारण किये हुए बाघों सूअरों और मृगों को बाणों से मार रहा था तब वह भिखारी कार्पटिक राजा के आगे रहकर सुदृढ़ (मजबूत) डंडे के प्रहार से ही उन हिंस्य पशुओं को मार डालता था ॥६६-६७॥ उस दरिद्र कार्पटिक के अद्भुत पराक्रम को देखकर उसे वीर मानता हुआ भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥६८॥ १ बोकेशियो वोन्ते मर की दसवें दिन की कथा इससे मिलती-जुलती है।—अनु.